संकष्‍ट श्रीगणेश चतुर्थी व्रत

(संकट टालने के लिए)

Sankashti Shri Ganesh Chaturthi Vrat Katha Puja Vidhi in Hindi
Sankashti Shri Ganesh Chaturthi Vrat Katha Puja Vidhi in Hindi

संकष्‍ट श्रीगणेश चतुर्थी व्रत का माहात्‍म्‍य

भविष्‍य पुराण में ऐसा कहा गया है कि जब-जब मनुष्‍य भारी कष्‍ट में हो, संकटों और मुसीबतों से घिरा महसूस करें या निकट भविष्‍य में किसी अनिष्‍ट की आशंका हो तो उसे चतुर्थी का व्रत करना चाहिए। इससे इस लोक और परलोक दोनों में सुख मिलता है। इस व्रत को करने से व्रती के सब कष्‍ट दूर हो जाते हैं। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है। मनुष्‍य वांछित फल पाकर अंत में गणपति को पा जाता है। यहां तक कि इस व्रत के करने से विद्यार्थी को विद्या और रोगी को आरोग्‍य की प्राप्ति भी होती है।

संकष्‍ट श्रीगणेश चतुर्थी व्रत की पूजन विधि-विधान

यूं तो संकष्‍टी श्री गणेश चतुर्थी व्रत प्रत्‍येक मास के कृष्‍ण पक्ष की चतुर्थी को किया जाता है, लेकिन माघ, श्रावण, मार्गशीर्ष और भाद्रपद में इस व्रत को करने का विशेष माहात्‍म्‍य है। व्रती इस दिन स्‍नानादि नित्‍य कर्मों से निवृत्त होकर स्‍वच्‍छ वस्‍त्र धारण करके दाहिने हाथ में पुष्‍प, अक्षत, गंध और जल लेकर संकल्प करें कि अमुक मास, अमुक पक्ष और अमुक तिथि में विद्या, धन, पुत्र, पौत्र प्राप्ति, समस्‍त रोगों से मुक्ति और समस्‍त संकटों से छुटकारे के लिए श्री गणेश जी की प्रसन्नता के लिए मैं संकष्‍ट चतुर्थी का व्रत करता हूँ।

इस संकल्प के बाद दिन भर मौन अथवा उपवास रखकर व्रती रहें। फिर सामर्थ्‍यानुसार गणेशजी की मूर्ति को कोरे कलश में जल भरकर, मुंह बांधकर स्‍थापित करें। गजानन भगवान् का चिंतन करते हुए उनका आह्वान करें। फिर गणेशजी का धूप-दीप, गंध, पुष्‍प, अक्षत, रोली आदि से षोडशोपचार पूजन सायंकाल में करें। पूजा के अंत में 21 लड्डओं का भोग लगाएं।

इसमें से 5 गणपति के सम्मुख भेंट कर शेष ब्राह्मणों और भक्तों में बांट दें। साथ में दक्षिणा भी दे दें और बोलें रात में चंद्रोदय होने पर यथाविधि चंद्रमा का पूजन कर क्षीरसागर आदि मंत्रों से अघ्‍यर्दान करें। त्तपश्‍चात् गणपति को अर्ध्‍य देते हुए नमस्‍कार करें और कहें कि हे देव! सब संकटों का हरण करें तथा मेरे अर्ध्‍य दान को स्‍वीकार करें।

अब आप फूल और दक्षिणा समेत पांच मोदकों को मेरी आपत्तियां दूर करने के लिए स्‍वीकारें। वस्‍त्र से ढका पूजित कलश, दक्षिणा और गणेशजी की प्रतिमा आचार्य को समर्पित कर दें। फिर भोजन ग्रहण करें। उल्लेखनीय है कि भादों मास की शुक्‍ल चतुर्थी को चंद्रदर्शन निषेध किया गया है, क्‍योंकि लोक विश्‍वास है कि इस चतुर्थी के चंद्र दर्शन से झूठा कलंक लगता है।

संकष्‍ट श्रीगणेश चतुर्थी व्रत की व्रत कथा

सत्‍युग में नल नामक एक राजा था, जिसकी दमयंती नामक रूपवती पत्‍नी थी। जब राजा नल पर विकट समय आया और उनका घर आग में जल गया अपना सब कुछ खोने के बाद अंत में राजा को पत्नी के साथ जगह-जगह भटकना पड़ा। इन सब में राजा अपनी पत्‍नी पुत्र से भी अलग हो गया। इस प्रकार कष्‍ट पाते हुए रानी दमयंती शरभंग ऋषि की कुटिया में पहुंची और अपनी दुखभरी कथा सुनाई इस पर ऋषि ने उन्हें संकष्‍टी व्रत का महात्‍म्‍य और विधि-विधान समझाया।

ऋषि ने बताया भाद्रपद मास की कृष्‍ण चतुर्थी को जो काई भी विधिपूर्वक श्री गणेश का पूजन करता है उसकी समस्‍त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और इस व्रत को करने से निश्चित रूप से सभी इच्छित मनोरथ सिद्ध होते हैं। रानी दमयंन्‍ती ने भाद्र पद मास की कृष्‍ण चतुर्थी से इस व्रत को आरंभ करके लगातार गणेश पूजन किया, तो उसे अपना पति, पुत्र और खोया हुआ राज्‍य फिर से प्राप्‍त हो गया। तभी से हर व्रत की परिपाटी चली आ रही है।

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