कार्तिक पूर्णिमा / गंगा स्नान पर्व
(मनोवांछित फल प्राप्ति के लिए)

कार्तिक पूर्णिमा / गंगा स्नान पर्व का माहात्म्य
श्रद्धालुओं के लिए कार्तिक पूर्णिमा बहुत महात्त्वपूर्ण दिवस है। इस दिन गंगा स्नान तथा सायंकाल दीप दान का विशेष महत्त्व है। इसी दिन भगवान् विष्णु ने मत्स्यावतार ग्रहण किया था। ऐसा माना जाता है कि इसी दिन सोनपुर में गंगा गंडकी के संगम पर गज और ग्राह का युद्ध हुआ था। गज की करुणामयी पुकार सुनकर विष्णु भगवान ने ग्राह का संहार कर गज की रक्षा की थी।
कहते हैं कि – इसी दिन भगवान् शंकर ने त्रिपुर नामक राक्षस को भस्म किया था। इसी दिन शिव के प्रकाश स्तंभ के प्रसाद से दुर्गारूपिणी पार्वती महिषासुर का वध करने हेतु शाक्ति अर्जित कर सही थी। इन्ही कारणों से हिंदुओं के लिए सभी पूर्णिमाओं में कार्तिक पूर्णिमा विशेष रूप से पवित्र मानी जाती हैं। इसी दिन लोग गंगा स्नान करके अपने पापों से मुक्ति प्राप्त करते हैं। आकाशदीप जलाकर ज्ञान और विद्या के प्रकाश का बोध कराते हैं। इस पूर्णिमा के गंगा स्नान करने से मनुष्य के सभी पाप धुल जाते हैं।
मान्यताओं के अनुसार कार्तिक माह में किए गए दान, व्रत, तप, जप आदि का लाभ आने वाले समय तक मिलता रहता है। वही माना जाता है कि अगर कोई व्यक्ति कार्तिक माह के आखिरी दिन यानी कार्तिक पूर्णिमा को गंगा स्नान करता है तो उसके लिए यह काफी फलदायी सिद्ध होता है। कार्तिक पूर्णिमा पर गंगा स्नान का विशेष महत्व बताया गया है। इस दिन गंगा में स्नान करना शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन गंगा में स्नान करने से पापों का प्रायश्चित किया जा सकता है। साथ ही इस दिन गंगा स्नान करने से ग्रह दोष भी दूर होते हैं।
कार्तिक पूर्णिमा पूजन विधि-विधान
कार्तिक पूर्णिमा को प्रात: काल गंगा स्नान करके विधि-विधान पूर्वक श्री सत्यनारायण भगवान् की कथा सुनी जाती है। सायंकाल देव-मंदिरों, चौराहों, गलियों, पीपल के वृक्षों तथा तुलसी के पौधों के पास दीपक जलाये जाते हैं और गंगाजी के जल में दीपदान किये जाते हैं। इस तिथि में ब्राह्मणों को दान देने, भोजन कराने, गरीबों को भिक्षा देने तथा बड़ों से आशीर्वाद प्राप्त करने का विधान है।
कार्तिक पूर्णिमा का पौराणिक संदर्भ
पुराणों में कहा गया है कि इसी तिथि पर शिवजी ने त्रिपुरा नामक राक्षस को मारा था। एक बार त्रिपुर राक्षस ने प्रयागराज में एक लाख वर्ष तक घोर तप किया। इस तप के प्रभाव से सब चराचर और देवता भयभीत हो उठे। अंत में सभी देवताओं ने मिलकर एक योजना बनाई कि अप्सराओं को भेजकर उसका तप भंग करवा दिया जाए। पर उन्हें सफलता न मिल सकी।
यह देख आखिर में ब्रह्माजी स्वयं उसके पास गए और उससे वर मांगने के लिए कहा। उसने मनुष्य तथा देवता द्वारा न मारे जाने का वरदान मांग लिया। ब्रह्माजी के इस वरदान से त्रिपुर तीनों लोकों में निर्भय होकर अघोर अत्याचार करने लगा। देवताओं के षडयंत्र से एक बार उसने कैलाश पर्वत पर चढ़ाई कर दी। शिव और त्रिपुर में भयंकर युद्ध हुआ। अंत में भगवान् शिव ने ब्रह्मा और विष्णु की सहायता से उसका वध किया।
तब से इस दिन का महत्त्व बढ़ गया, इसी दिन त्रिपुरोत्सव भी होता है, इस दिन खीर दान का विशेष महत्त्व है। खीर का दान 24 उंगली के बर्तन में दूध भरकर उसमें सोने या चांदी की बनी मछली छोड़कर किया जाता है। काशी में यह तिथि देव दीपावली महोत्सव के रूप में मनायी जाती है।
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