भैरव अष्‍टमी व्रत

(सौभाग्‍य प्राप्ति एवं पितरों के तर्पण के लिए)

Kaal Bhairav Ashtami Vrat Katha Aur Mahatva in Hindi
Kaal Bhairav Ashtami Vrat Katha Aur Mahatva in Hindi

भैरव अष्‍टमी व्रत का माहात्‍म्‍य

पुराणों में ऐसा उल्‍लेख में मिलता है कि भैरव भगवान् शिव के ही दूसरे रूप हैं। इसी दिन को दोपहर के समय शिवजी के प्रिय गण भैरवनाथ का जन्‍म हुआ था। भैरव से काल भी भयभीत रहता है, इसीलिए इन्‍हें कालभैरव के नाम से भी जाना जाता है। काशी में भैरवजी के अनेक मंदिर बने हुए हैं जिनमें से सबसे अधिक अधिक प्रसिद्ध मंदिर कालभैरव का है।

भैरव अष्‍टमी के व्रत को गणेश, विष्‍णु, यम, चंद्रमा, कुबेर आदि ने किया था। इसी व्रत के प्रभाव से भगवान् विष्‍णु लक्ष्‍मी के पति बने। यह सब कामनाओं को देने वाला सर्वश्रेष्‍ठ व्रत है। जो इस व्रत का निरंतर करता रहता है, वह महापापों से छूट जाता है। उसे सब ऐश्‍वर्य मिल जाते हैं। ऐसी मान्‍यता है कि भैरव अष्‍टमी के दिन प्रात: काल स्‍नान कर पितरों का श्रार्द्ध और तर्पण करने के उपरांत यदि कालभैरव की पूजा की जाए तो उसे उपासक के वर्ष भर के सारे विघ्‍न टल जाते हैं।

उसे लौकिक, परलौकिक बाधाओं से मुक्ति मिलती है। यहां तक कि आय में वृद्धि के साथ-साथ वह धीरे-धीरे विपुल धन-धान्‍य से भी समृद्ध होता है। महाकाल भैरव के मंदिर में चढ़ाए हुए काले धागे को जो मनुष्‍य अपने गले या बाजू पर बांधता है, उसे भूत-प्रेत तथा जादू-टोने का असर नहीं होता।

भैरव अष्‍टमी व्रत की पूजन विधि-विधान

यह व्रत मार्गशीर्ष (अगहन) मास के कृष्‍ण पक्ष की अष्‍टमी को रखा जाता है। इस दिन उपवास रखकर संकल्‍प करें। प्रात:काल दांतों को साफ कर स्‍नान करें। तर्पण करके प्रत्‍येक पहर में कालभैरव एवं ईशान नाम के शिव शंकर भोलेनाथ का विधिपूर्वक पूजन करके तीन बार अर्ध्‍य दें। आधी रात में धूमधाम से शंख, घंटा, नगाड़ा आदि बजाकर कालभैरव की आरती करें। फिर पूर्ण रात्रि जागरण कर शिवजी और भैरवनाथ की कथाएं सुनें। जैसा कि हम सब जानते हैं कि भैरव भगवान् का वाहन कुत्ता माना जाता है। इसीलिए श्रद्धालु लोग उसकी भी पूजा करते हैं। कुछ भक्तगण तो उसे प्रसन्न करने के लिए दूध पिलाते हैं या मिठाई भी खिलाते हैं।

भैरव अष्‍टमी व्रत कथा हिन्‍दी में

विश्‍व का परम तत्त्व कौन है? इस विषय पर एक बार ब्रह्मा और भगवान् विष्‍णु में विवाद उठ खड़ा हुआ। दोनों ही अपने को विश्‍व का नियंता तथा परम तत्त्व मानने पर अड़े रहे। विवाद बढ़ता देख इसका निर्णय महर्षियों को सौंपा गया। उन्‍होंने कहा कि भगवान शिव एक व्‍यक्त सत्ता है एवं ब्रह्मा और विष्‍णु दोनों ही उसे विभूति से निर्मित हैं, इसलिए उनमें उसके अंश उपस्थित हैं।

यह बात भगवान् विष्‍णु ने तो सहर्ष स्‍वीकार कर ली, लेकिन ब्रह्माजी ने इस निर्णय की अवज्ञा करके अपने को सर्वोपरि तथा सृष्टि का नियंता बताना जारी रखा। यह बात भगवान शंकर को स्‍वीकार नहीं हुई। कहा जाता है कि तत्काल ही उन्‍होंने भैरव का रूप धारण कर ब्रह्मा का अहंकार नष्‍ट किया। संयोग से उस दिन मार्गशीर्ष मास के कृष्‍ण पक्ष की अष्‍टमी थी, अत: इस दिन को भैरव अष्‍टमी व्रत के रूप में मनाया जाने लगा।

उल्लेखनीय है कि हमें भैरव अष्‍टमी काल का स्‍मरण कराती है, इसलिए मृत्‍यु के भय के निवारण हेतु काल भैरव की शरण में जाने की सलाह धर्मशास्‍त्र देते हैं। विश्‍वास किया जाता है कि काल भैरव सदा ही सामाजिक मर्यादाओं का पालन करने वाले, धर्मसाधक, शांत प्रकृति, क्षमाशील, सहिष्‍णु मनुष्‍यों की काल से रक्षा करते हैं। इसी विश्‍वास के साथ यह व्रत किया जाता है।

यह भी पढ़ें:-

कार्तिक पूर्णिमा / गंगा स्‍नान पर्व का महत्व एवं पौराणिक संदर्भ

तुलसी विवाह व्रत कथा एवं माहात्‍म्‍य Tulsi Vivah Ka Mahatva in Hindi

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *