तुलसी विवाह व्रत
(स्त्रियों का व्रत : लोक-परलोक सुधार एवं यश, वैभव प्राप्ति के लिए)

तुलसी विवाह व्रत का माहात्म्य
प्रतिवर्ष कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी व्रत को महिलाएं तुलसी और शालिग्राम का विवाह कराती हैं। भारतीय नारी तुलसी को सौभाग्यदायिनी मानकर उसकी पूजा और व्रत करती हैं। तुलसी विवाह का उत्सव यूं तो सारे भारत में प्रचलित है, लेकिन विशेष रूप से इसे उत्तर भारत में मनाया जाता है। तुलसी के दर्शन, स्पर्श, ध्यान, अर्चना, आरोपण एवं सिंचन से अनेक युगों के पाप नष्ट हो जाते हैं। तुलसी समस्त सौभाग्य देने वाली और आधि-व्याधि को मिटाने वाली देवी हैं।
तुलसी विवाह व्रत की पूजन विधि-विधान
इस दिन उपवास रखने का विधान है, जिसमें अन्न का सेवन न कर केवल फलाहार लिया जाता है। आमतौर पर कार्तिक स्नान करने वाली स्त्रियां तुलसी तथा शालिग्राम का विवाह करती हैं। नए कपड़े, जनेऊ आदि का दान करती हैं। भगवान् विष्णु की प्रतिमा में प्राण प्रतिष्ठा करके उसे वस्त्र और आभूषण से सजाकर, ससम्मान गाजे-बाजे के समारोह के साथ तुलसी चौरा पर ले जाया जाता है। फिर उस जगह विधि पूर्वक पूजन के बाद दोनों का विवाह रचाया जाता है। इस अवसर पर स्त्रियां विवाह के गीत गाती हैं। तत्पश्चात् व्रत की समाप्ति की जाती है। कुछ स्त्रियां तुलसी की 108 परिक्रमाएं करके उसे भोग, पकवान चढ़ाकर भोजन करती हैं।
तुलसी विवाह व्रत कथा
प्राचीन समय में जालंधर नामक एक दैत्य ने अपने उत्पातों के कारण सभी को भयभीत कर रखा था। उसकी पत्नी वृंदा रुपवती होने के साथ एक पतिव्रता स्त्री थी। उसी के प्रताप से वह सर्वविजयी बना हुआ था। उस दैत्य से भयभीत होकर ऋषि, मुनि और देवतागण भगवान् विष्णु के पास अपनी विपदा सुनाने पहुंचे तो उन्होंने वृंदा का पतिधर्म भंग करके उसका बल क्षीण करने का निश्चय किया। भगवान् विष्णु ने अपनी योगमाया से एक मृ शरीर वृंदा के आंगन में फेंकवा दिया
उसे अपने पति का शरीर समझकर वृंदा ने उसका आलिंगन कर लिया। इससे उसका पतिधर्म नष्ट हो गया। जबकि उसका पति तो देवलोक में इंद्र से युद्ध कर रहा था। इधर वृंदा का सतीत्व नष्ट हुआ तो उसका पति युद्ध में हारकर मृत्यु को प्राप्त हुआ। जब वृंदा को वस्तुस्थिति ज्ञात हुई कि यह सब भगवान् का छल-कपट था, तो उसने क्रोधित होकर भगवान विष्णु को शाप दे दिया कि जिस प्रकार तुमने मुझे छल से पति-वियोगी बनाया है, ठीक उसी तरह तुम भी अपनी पत्नी का छलपूर्वक हरण होने पर उसके वियोग को सहन के लिए मृत्युलोक में जन्म लोगे।
इतना कहकर वृंदा अपने पति के शव के साथ उसके वियोग में तड़पती हुई सती हो गई। पार्वती ने वृंदा की भस्म में तुलसी, आंवला और मालती के वृक्ष लगाए। इनमें से तुलसी को भगवान् विष्णु ने वृंदा का रूप समझकर अपनाया। कुछ लोग यह भी मानते हैं कि भगवान विष्णु ने छल से वृंदा का सतीत्व भंग कराया था तो उसने उन्हें पत्थर बनने का शाप दिया था।
इस पर भगवान विष्णु ने कहा था- तुम मुझे लक्ष्मी से भी ज्यादा प्रिय हो गई हो। यह सब तुम्हारे सतीत्व का ही फल है कि तुलसी बनकर तुम सदा मेरे साथ रहोगी। जो भी तुम्हारे साथ मेरा विवाह करेंगा, वह परम धाम को प्राप्त होगा। यही कारण है कि शालिग्राम की पूजा बिना तुलसी दल चढ़ाए अधूरी मानी जाती है। इस प्रकार स्त्रियां प्रतिवर्ष तुलसी का विवाह भगवान् विष्णु की प्रसन्नता पाने के लिए ही करती हैं।
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