अन्नकूट / गोवर्धन पूजन पर्व
(भगवान् श्रीकृष्ण को प्रसन्न करने तथा गोवंश की रक्षा के लिए)

अन्नकूट / गोवर्धन पूजन पर्व का माहात्म्य
हमारे कृषि प्रधान देश में गोवर्धन पूजा जैसे प्रेरणाप्रद पर्व की अत्यंत आवश्यकता है। इसके पीछे क महान् संदेश गो यानी पृथ्वी और गाय दोनों की उन्नति तथा विकास की ओर ध्यान देना और संवर्धन के लिए सदा प्रयत्नशील होना छिपा है। अन्नकूट का महोत्सव भी गोवर्धन पूजा के दिन कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को ही मनाया जाता है। यह ब्रजवासियों का मुख्य त्यौहार है। अन्नकूट या गोवर्धन पूजा का पर्व यूं तो अति प्राचीन काल से मनाया जाता रहा है लेकिन आज जो विधान मौजूद है वह भगवान श्री कृष्ण के इस धरा पर अवतरित होने के बाद द्वापर युग से आरंभ हुआ है।
धर्मग्रन्थ में इस दिन इंद्र, वरुण, अग्नि आदि देवताओं का पूजा करने का उल्लेख मिलता है। उल्लेखनीय है कि ये पूजन पशुधन व अन्न आदि के भंडार के लिए किया जाता है। बालखिल्य ऋषि का कहना है कि अन्नकूट और गोवर्धन उत्सव श्री विष्णु भगवान् की प्रसन्नता के लिए मनाना चाहिए। इन पर्वों से गौओं का कल्याण होता है, पुत्र, पौत्रादि, संततियां प्राप्त होती हैं, ऐश्वर्य और सुख प्राप्त होता है। कार्तिक के महीने में जो कुछ भी जप, होम, अर्चन किया जाता है, इन सबकी फलप्राप्ति हेतु गोवर्धन पूजन अवश्य करनी चाहिए।
गोवर्धन पूजन विधि-विधान
यह पर्व कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को मनाया जाता है। इस दिन प्रात:काल शरीर पर तेल की मालिश करके स्नान करना चाहिए। फिर घर के द्वार पर गोबर से गोवर्धन बनाएं। गोबर का अन्नकूट बनाकर उसके समीप विराजमान श्रीकृष्ण के सम्मुख गाय तथा ग्वाल-बालो, इद्र, वरुण, अग्नि और बलि का पूजन षोडशोपचार (षोडशोपचार पूजा हिंदू धर्म में देवी-देवताओं की 16 विशेष सामग्रियों और सत्कार के साथ की जाने वाली एक विस्तृत और पवित्र पूजन विधि है।) द्वारा करें। विभिन्न प्रकार के पकवानों व मिष्ठानों का भोग लगाकर पहाड़ की आकृति तैयार करें और उनके मध्य श्री कृष्ण की मूर्ति रख दें। पूजन के पश्चात् कथा सुनें। प्रसाद रूप में दही व चीनी का मिश्रण सब में बांट दें। फिर पुरोहित को भोजन करवाकर उसे दान-दक्षिणा से प्रसन्न करें।
गोवर्धन पूजन का पौराणिक संदर्भ
वैदिक काल में इंद्र सर्वश्रेष्ठ देवता थे। ऐसी मान्यता थी कि उनकी ही कृपा से वर्षा होती हैं। जिसके कारण अन्न पैदा होता है। द्वापर युग में भगवान कृष्ण के समय में भी ब्रज में लोग पड़वा के दिन इंद्र की पूजा करते थे। कृष्ण जी ने यह पूजा बंद करा दी और ब्रज में स्थित गोवर्धन पहाड़ पर गये। वहां साक्षात् रूप से श्री कृष्ण जी ने गोवर्धन का रूप रखकर भोजन कर सबको संतुष्ट किया। इससे इंद्र रुष्ट हो गये और ब्रज में इतनी वर्षा की कि चारों ओर पानी-पानी हो गया। श्री कृष्ण जी ने अपनी अंगली पर गोवर्धन पहाड़ को उठा लिया। उसके नीचे सब गोप-गोपियां व गाय-बछड़ों को खड़ा करके ब्रज की रक्षा की। इंद्र का अभिमान टूट गया, उन्हें हार माननी पड़ी।
वर्षा समाप्त हो जाने पर सबको लेकर कृष्ण ब्रज में लौटे। तब से गोवर्धन की यह पूजा होने लगी। इसी उपलब्ध में पड़वा को छप्पन प्रकार के भोजन बनाकर भगवान का भेग लगाया जाता है। पहाड़ों पर गौ बछड़े जाने से गोबर ही गोबर हो गया था – इसलिए गोबर की आकृति वाला गोवर्धन का रूप बनाकर गौधूल के समय स्त्री-पुरुष इसकी पूजा करते हैं, परिक्रमा लगाते हैं। आरती, भजन, कीर्तन करके लोग उत्सव मानते हैं। दही, धान की खील व बतासे चढ़ाते हैं। रोली, चावल से पूजा करके फूल चढ़ाते हैं। गोवर्धन की मूर्ति के पास दही, मथानी भी आदि भी रखे जाते हैं तथा घी या तेल का दीपक जलाया जाता है।
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