धन तेरस पर्व

(दीर्घायु एवं स्‍वस्थ जीवन हेतु)

Dhanteras Parv Ka Mahatva Aur Puja Vidhan in Hindi
Dhanteras Parv Ka Mahatva Aur Puja Vidhan in Hindi

धन तेरस पर्व का माहात्म्‍य और क्‍यों मनाया जाता है।

धनतेरस का त्यौहार दीपावली आने की पूर्व सूचना देता है। इद दिन भगवान् धन्वंतरी क्षीरसागर से अमृत कलश लेकर प्रकट हुए थे, इसलिए वैद्य समाज हर्षोल्लास के साथ धन्वंतरी जयंती मनाता है। धनतेरस के दिन दीर्घायु और स्वस्थ जीवन की कामना से भगवान् धन्वतरी का पूजन किया जाता है। इस दिन यमराज की भी पूजा की जाती है। धनतेरस के दिन लक्ष्‍मी का आवास घर में माना जाता है। इस तिथि को पुराने बर्तनों के बदले नया बर्तन खरीदना शुभ माना जाता हे। ऐसा विश्‍वास किया जाता है कि इस दिन चांदी के बर्तन खरीदने से अधिक पुण्‍य लाभ मिलता है।

धन तेरस पर्व पूजन विधि-विधान।

यह त्यौहार कार्तिक मास के कृष्‍ण पक्ष की त्रयोदशी को मनाया जाता है। इस दिन यमराज के लिए आटे से निर्मित दीपक बनाकर घर के मुख्‍य द्वार पर रखने का विधान है। रात्रि को घर की स्त्रियां इस दीपक में सरसों का तेल डालकर चार बत्तियां जलाती हैं और जल, रोली, चावल, फूल, गुड़, नैवेद्य आदि सहित दीपक जलाकर यमराज का पूजन करती हैं। यह दीपक रातभर जलना चाहिए।

यह पूजा दिन छुपने के बाद की जाती है। पूजा में चढ़ाया गया सामान ब्राह्मण को दे दिया जाता है तथा इस दिन भगवान् धन्‍वंतरी का विधिवत पूजन करने का विशेष महत्व है।

धन तेरस पर्व का पौराणिक संदर्भ।

एक समय यमराज ने अपने दूतों से पूछा कि क्‍या कभी तुम्‍हें प्राणियों के प्राण का हरण करते समय किसी पर दयाभाव भी आया है, तो वे संकोच में पड़कर बोले- नहीं महाराज! हमें दयाभाव से क्‍या मतलब। हम तो बस आपकी आज्ञा का पालन करने में लगे रहते हैं।

यमराज ने उनसे दुबारा पूछा तो उन्‍होंने संकोच छोड़कर बताया कि एक बार एक ऐसी घटना घटी थी, जिससे हमारा हृदय कांप उठा था। हेम नामक राजा की पत्नी ने जब एक पुत्र को जन्‍म दिया तो ज्‍योतिषियों ने नक्षत्र गणना करके बताया कि यह बालक जब भी विवाह करेगा उसके चार दिन बाद ही मर जायेगा।

यह जानकर उस राजा ने बालक को स्त्रियों की छाया तक से बचाने के हेतु यमुना तट की एक गुफा में ब्रह्मचारी के रूप में रखकर बड़ा किया। संयोग से एक दिन जब महाराजा हंस की युवा बेटी यमुना तट पर घूम रही थी तो उस ब्रह्मचारी युवक ने मोहित होकर उससे गंधर्व विवाह कर लिया। चौथा दिन पूरा होते ही वह राजकुमार मर गया।

अपने पति की मृत्‍यु देखकर उसकी पत्नी बिलख-बिलख कर रोने लगी। उस नवविवाहिता का करुण विलाप सुनकर हमारा हृदय भी कांप उठा। हमने जीवन में कभी भी ऐसी सुंदर जोड़ी नहीं देखी थी। वे दोनों साक्षात् कामदेव व रति के अवतार मालूम होते थे। उस राजकुमार के प्राण हरण करते समय हमारे आंसू नहीं रुक रहे थे।

यह सुनकर यमराज ने कहा- क्‍या करें, विधि के विधानानुसार उसकी मर्यादा निभाकर हमें ऐसे अप्रिय कार्य करने ही पड़ते हैं। क्‍या अकाल मृत्‍यु से बचने का कोई उपाय नहीं है एक यमदूत ने उत्‍सुकतावश पूछा। यमराज बोले- हां उपाय तो है। अकाल मृत्‍यु से छुटकारा पाने के लिए व्‍यक्ति को धनतेरस के दिन पूजन और दीपदान विधिपूर्वक करना चाहिए। इससे अकाल मृत्‍यु का भय नहीं रहता है।

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