मौनी अमावस्‍या व्रत

(सभी पापों की मुक्ति हेतु)

Mauni Amavasya Vrat Katha Aur Puja Vidhi Mahatva in Hindi
Mauni Amavasya Vrat Katha Aur Puja Vidhi Mahatva in Hindi

मौनी अमावस्‍या व्रत का माहात्‍म्‍य

माघ माह में कृष्‍ण पक्ष की अमावस्‍या को मौनी अमावस्‍या कहते हैं। इस दिन मौन रहना चाहिए। इस व्रत को मौन धारण करके समापन करने वाले को मुनि पद की प्राप्ति होती है। इसलिए इस दिन मौन व्रत रखकर मन को संयम में रखने का विधान बनाया गया है। शास्‍त्रों में भी वर्णित है कि होंठों से ईश्‍वर का जाप करने से जिना पुण्‍य मिलता है, उससे कई गुणा अधिक पुण्‍य मन में हरि का नाम लेने से मिलता है।

मौनी अमावस्‍या व्रत का पूजन विधि-विधान

मौनी अमावस्‍या के दिन संगम में स्‍नान करना चाहिए। स्‍नान करने के बाद मौन व्रत संकल्प लें। भगवान विष्‍णु की प्रतिमा का पीले फूल, केसर, चंदन, घी का दीपक और प्रसाद के साथ पूजन करें। भगवान का ध्‍यान करने के बाद विष्‍णु चालीसा या विष्‍णु सहस्‍त्रनाम का पाठ करें। ब्राह्मणों और गरीबों को दान दक्षिणा जरूर दें। मंदिर में दीप दान करना ना भूलें। शाम को धूप-दीप से आरती करें। पीले मीठे पकवान का भोग लगाएं। गौ माता को मीठी रोटी या हरा चारा खिलने के बाद व्रत खोलें।

मौनी अमावस्‍या व्रत कथा हिंदी में

कांचीपुरी नगर में देवस्‍वामी नाम का एक ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्‍नी का नाम धनवती और पुत्री का नाम गुणवती था। उसके सात पुत्र थे। देवस्‍वामी ने सातों पुत्रों का विवाह करने के पश्‍चात् अपनी पुत्री के विवाह के लिए योग्‍य वर की तलाशी के लिए बड़े बेटे को नगर से बाहर भेज दिया और इसके बाद देवस्‍वामी ने अपनी पुत्री गुणवती की कुंडली एक ज्‍योतिषी को दिखाई। ज्‍योतिषी ने गुणवती की कुंडली देखकर कहा कि सप्‍तपदी होते-होते ही यह कन्‍या विधवा हो जाएगी।

यह बात सुनकर देवस्‍वामी अत्‍यंत दु:खी हुई और इसका उपाय पूछने लगी। ज्‍योतिषी ने उपाय बताया कि इस योग का निवारण सिंहलद्वीप वासिनी सोमा नामक धोबिन को घर बुलाकर उसकी पूजा करने से ही संभव होगा। यह सुनकर देवस्‍वामी ने अपने सबसे छोटे लड़के के साथ अपनी पुत्री को सोमा धोबिन को घर लाने के उद्देश्‍य से सिंहलद्वीप जाने के लिए रवाना किया।

वे दोनों समुद्र के तट पर पहुंचे और समुद्र को पार करने का उपाय सोचने लगे, लेकिन कोई उपाय नही सुझा तो दोनों भाई-बहिन भूखे-प्‍यासे एक वट-वृक्ष की छाया में उदास होकर बैठे गए। उस वृक्ष पर गिद्ध के बच्‍चे रहते थे। े दिनभर इन दोनों को परेशान होते हुए देख रहे थे। शाम को बच्‍चों की माँ उनके लिए कुछ आहार लेकर आई और उन्‍हें खिलाने लगी। लेकिन गिद्ध के बच्‍चों ने कुछ नहीं खाया और अपनी माँ से कहा कि इस वृक्ष के नीचे आज सुबह से ही दो भूखे-प्‍यासे प्राणी बैठे हैं।

जब तक वे नहीं खाएंगे, हम लोग भी नहीं खाएंगे। बच्‍चों की बात सुनकर उनकी माँ गिद्धनी को दया आ गई। उसने दोनों प्राणियों को देखा और उनके पास जाकर कहा कि आपकी इच्‍छा मैंने जान ली है। आप लोग भोजन करें। कल प्रात: मैं आप लोगों को समुद्र पार सोमा के घर पहुँचा दूंगी।

गिद्धनी का बात सुनकर उन दोनों भाई-बहिन की चिंता कम हुई, दोनों को अत्‍यंत प्रसन्‍नता हुई, उन्‍होंने गिद्धनी को प्रणाम कर भोजन किया। प्रात: होते-होते गिद्धनी ने उन्‍हें सोमा के घर पहुंचा दिया। जिसके बाद वे सिंहलद्वीप वासिनी सोमा नामक धोबिन के घर लेकर आई और उसकी पूजा की। जिसके बाद उनकी पुत्री का विवाह हो गया।

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