करवा चौथ / करक चतुर्थी व्रत
(स्त्रियों का व्रत – पति की मंगलकामना और
अखंड सौभाग्य प्राप्त करने के लिए)

करवा चौथ व्रत का माहात्म्य
यह व्रत कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को रखा जाता है। यह व्रत सौभाग्यवती स्त्रियों द्वारा अपने अखंड सौभाग्य (सुहाग), पति के स्वस्थ एवं दीर्घायु होने की मंगल कामना के लिय किया जाता है। इस व्रत को करने से पुत्र, धन-धान्य, सौभाग्य एवं अतुलयश की प्राप्ति होती है। सौभाग्यवती स्त्रियां एक दिन पहले स्नानादि कर हाथों में मेंहदी रचाती है और करवाचौथ के दिन साज श्रृंगार मंगल गान गाती है। करवा चौथ व्रत का हिन्दू संस्कृति में विशेष महत्त्व है। करवा चौथ में दो शब्द हैं। पहला शब्द करवा, जिसका अर्थ होता है कि मिट्टी से बना बर्तन। जबकि चौथ से आशय चतुर्थी तिथि से है। सुहागिनों को इस दिन निर्जला व्रत रखना चाहिए। मान्यता है कि करवा का प्रयोग जीवन में सुख-समृद्धि को दर्शाता है। इस दिन विवाहित स्त्रियां अपने पति के लिये विधि विधान के साथ लम्बी उम्र एवं सुखी जीवन की कामना हेतु निर्जला व्रत रखती है। रात्रि को चन्द्रमा निकलने पर उसे अर्घ्य देकर पति से आशीर्वाद लेकर भोजन ग्रहण करना चाहिए। करवा चौथ पति-पत्नी के बीच एक प्रेम और विश्वास से परिपूर्ण अटूट बंध को दर्शाता है।
करवा चौथ व्रत की पूजन विधि
व्रत रखने वाली स्त्री प्रात:काल नित्यकर्मों से निवृत्त होकर, स्नान एवं संध्या आदि करके, आचमन के बाद संकल्प लेकर यह कहे कि मैं अपने सौभाग्य एवं पुत्र-पौत्रादि तथा निश्चल संपत्ति की प्राप्ति के लिए करवा चौथ के व्रत को करूंगी। यह व्रत निराहार ही नहीं, अपितु निर्जला के रूप में करना अधिक फलप्रद माना जाता है।
इस व्रत में शिव-पार्वती, कार्तिकेय और गौरी का पूजन करने का विधान है। चंद्रमा, शिव, पार्वती स्वामी कार्तिकेय और गौरी की मूर्तियों की पूजा षोडशोपचार विधि से विधिवत करके, एक तांबे या मिट्टी के पात्र में चावल, उड़द की दाल, सुहाग की सामग्री, जैसे- सिंदूर, चूडियां, शीशा। कंघी, रिबन और रुपया रखकर किसी श्रेष्ठ सुहागिन स्त्री या अपनी सास के पांव छूकर उन्हें भेंट कर देनी चाहिए।
चंद्रमा निकलने से लगभग एक घंटे पहले पूजा शुरू की जानी चाहिए। अच्छा हो कि परिवार की सभी महिलाएँ साथ पूजा करें। पूजन के समय देव-प्रतिमा का मुख पश्चिम की तरफ़ होना चाहिए तथा स्त्री को पूर्व की तरफ़ मुख करके बैठना चाहिए। पूजन सामग्री में धूप, दीप, चंदन, रोली, सिन्दूर आदि थाली में रखें। दीपक में पर्याप्त मात्रा में घी रहना चाहिए, जिससे वह पूरे समय तक जलता रहे। रोली, चावल, गुड़ आदि से गणपति की पूजा करें। रोली से करवे पर स्वास्तिक बनाएं और 13 बिन्दियां रखें। स्वयं भी बिन्दी लगाएं और गेहूं के 13 दाने दाएं हाथ में लेकर कथा सुनें। कथा सुनने के बाद अपनी सासूजी के चरण स्पर्श करें और करवा उन्हें दे दें। पानी का लोटा और गेहूं के दाने अलग रख लें। चंन्द्र दर्शन छलनी के द्वारा किया जाना चाहिए और साथ ही दर्शन के समय अर्ध्य के साथ चन्द्रमा की पूजा करनी चाहिए। अर्ध्य देकर अपने पति के हाथ से जल एवं मिष्ठान खाकर व्रत खोले। च्रन्द्र-दर्शन के बाद बहू अपनी सास को थाली में सजाकर मिष्ठान, फल, मेवे, रूपये आदि देकर उनका आशीर्वाद ले और सास उसे अखंड सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद दें।
यदि कहानी पंडिताइन से सुनी हो तो गेहूं, चीनी और पैसे उसे दे दें। यदि बहन-बेटी हो तो गेहूं, चीनी और पैसे उसे दे दें।
करवा चौथ का उजमन
एक थाल में चार-चार पूडि़यां, तेरह जगह रखकर उनके ऊपर थोड़ा-थोड़ा हलवा रख दें। थाल में एक साड़ी, ब्लाउज और सामर्थ्यानुसार रुपया भी रखें। फिर उसके चारों ओर रोली-चावल से हाथ फेरकर अपनी सासूजी के चरण स्पर्श कर उन्हें दे दें। तदुपरांत तेरह ब्राह्मण/ब्राह्मणियों को आदर सहित भोजन कराएं, दक्षिणा दें तथा रोली की बिन्दी/तिलक लगाकर उन्हें विदा करें।
करवा चौथ व्रत कथा
एक साहूकार के एक पुत्री और सात पुत्र थे। करवा चौथ के दिन साहूकार की पत्नी, बेटी और बहुओं ने व्रत रखा। रात्रि को साहूकार के पुत्र भोजन करने लगे तो उन्होंने अपनी बहन से भोजन करने के लिए कहा। बहन बोली- ”भाई! अभी चन्द्रमा नहीं निकला है, उसके निकलने पर मैं अर्ध्य देकर भोजन करूंगी।”
इस पर भाइयों ने नगर से बाहर जाकर अग्नि जला दी और छलनी ले जाकर उसमें प्रकाश दिखाते हुए बहन से कहा- ”बहन! चन्द्रमा निकल आया है। अर्ध्य देकर भोजन कर लो।”
बहन अपनी भाभियों को भी बुला लाई कि तुम भी चन्द्रमा को अर्ध्य दे लो, किन्तु वे अपने पतियों की करतूतें जानती थी। उन्होंने कहा-”बाईजी! अभी चन्द्रमा नहीं निकला है। तुम्हारे भाई चालाकी करते हुए अग्नि का प्रकाश छलनी से दिखा रहे हैं।”
किन्तु बहन ने भाभियों की बात पर ध्यान नहीं दिया और भाइयों द्वारा दिखाए प्रकाश को ही अर्ध्य देकर भोजन कर लिया। इस प्रकार व्रत भंग होने से गणेश जी उससे रुष्ट हो गए। इसके बाद उसका पति सख्त बीमार हो गया और जो कुछ घर में था, उसकी बीमारी में लग गया। साहूकार की पुत्री को जब अपने दोष का पता लगा तो वह पश्चाताप से भर उठी। गणेश जी से क्षमा-प्रार्थना करने के बाद उसने पुन: विधि-विधान से चतुर्थी का व्रत करना आरम्भ कर दिया। श्रद्धानुसार सबका आदर-सत्कार करते हुए, सबसे आशीर्वाद लेने में ही उसने मन लगा दिया।
इस प्रकार उसके श्रद्धाभक्ति सहित कर्म को देख गणेश जी उस पर प्रसन्न हो गए। उन्होंने उसके पति को जीवनदान दे उसे बीमारी से मुक्त करने के पश्चात् धन-सम्पत्ति से युक्त कर दिया।
विनायक रूवरूप गणेश जी की करवा चौथ व्रत कथा
इस प्रकार में अपने पुत्र और पुत्रवधु के साथ एक नेत्रहीन बुढि़या रहती थी। वह श्रद्धापूर्वक विधि-विधान से नित्य ही गणेश जी की पूजा-अर्चना करती थी। एक दिन प्रसन्न हो गणेश जी प्रकट हुए और बोले- ”बुढि़या मां! तू जो चाहे सो मांग ले।”
बुढि़या बोली- ”कैसे और क्या मांगू? मुझे तो मांगना आता ही नहीं है।”
तब गणेश जी बोले- ”अपने बहू-बेटे से पूछकर मांग लेना। मैं कल फिर आऊंगा।”
बुढि़या ने बेटे से पूछा तो बेटा बोला कि ‘धन मांग लो।’ बहू बोली कि ‘पोता मांग लो।’ तब बुढि़या ने सोचा कि ये दोनों तो अपने-अपने मतलब की बात कह रहे हैं। अत: बुढि़या ने पड़ोसिनों से पूछा। पड़ोसिनों ने कहा- ”बुढि़या, तू तो थोड़े ही दिन जिएगी। क्यों तू धन मांगे और क्यों पोता मांगे। तू तो आंखें मांग ले, जिससे तेरा बाकी जीवन आराम से कट जाए।”
लेकिन उस बुढि़या ने पड़ोसिनों की बात नहीं मानी। उसने सोचा कि जिसमें बहू-बेटा राजी हों, वह मांग लूं और अपने मतलब की चीज भी मांग लूं। अगले दिन गणेश जी आए और बोले- ”बुढि़या मां! जो चाहे सो मांग लें।”
बुढि़या बोली- ”यदि आप प्रसन्न हैं तो मुझे नौ करोड़ की माया दें। निरोगी काया दें, आंखों की रोशनी दें, पोता दें, सब परिवार को सुख दें और अंत में मोक्ष दें।”
गणेश जी बोले-”बुढि़या मां! तूने तो हमें ठग लिया। किन्तु तेरा वर तुझे मिलेगा- तथास्तु!” इतना कहकर गणेश जी अंतर्धान हो गए। बुढि़या को वर के अनुसार सब कुछ मिल गया।
हे सिद्धि विनायक गणेश जी! जैसे तुमने उस बुढि़या को सब कुछ दिया, वैसे ही हमें भी देने की कृपा करना। बोलो गणपति बाबा की जय!
माता पार्वती और शंकरजी की करवा चौथ व्रत कथा
एक बार पांडु पुत्र अर्जुन तपस्या करने नीलगिरी नामक पर्वत पर गए। इधर द्रोपदी बहुत परेशान थी। उनकी कोई खबर न मिलने पर उन्होंने कृष्ण भगवान का ध्यान किया और अपनी चिंता व्यक्त की। कृष्ण भगवान ने कहा- बहना, इसी तरह का प्रश्न एक बार माता पार्वती ने शंकर जी से किया था।
पूजन कर चंद्रमा को अर्ध्य देकर फिर भोजन ग्रहण किया जाता है। सोने, चाँदी या मिट्टी के करवे का अापस में आदान-प्रदान किया जाता है, जो आपसी प्रेम-भाव को बढ़ाता है। पूजन करने के बाद महिलाएँ अपने सास-ससुर एवं बड़ों को प्रणाम कर उनका आशीर्वाद लेती हैं।
तब शंकरजी ने माता पार्वती को करवा चौथ का व्रत बतलाया। इस व्रत को करने से स्त्रियाँ अपने सुहाग की रक्षा हर आने वाले संकट से वैसे ही कर सकती हैं, जैसे एक ब्राह्मण ने की थी। प्राचीन काल में एक ब्राह्मण था। उसके चार लड़के एवं एक गुणवती लड़की थी।
एक बार लड़की मायके में थी, तब करवा चौथ का व्रत पड़ा। उसने व्रत को विधिपूर्वक किया। पूरे दिन निर्जला रही। कुछ खाया-पीया नहीं, पर उसके चारों भाई परेशान थे कि बहन को प्यास लगी होगी, भूख लगी होगी, पर बहन चंद्रोदय के बाद ही जल ग्रहण करेगी।
भाइयों से न रहा गया, उन्होंने शाम होते ही बहन को बनावटी चंद्रोदय दिखा दिया। एक भाई पीपल की पेड़ पर छलनी लेकर चढ़ गया और दीपक जलाकर छलनी से रोशनी उत्पन्न कर दी। तभी दूसरे भाई ने बहन को आवाज दी- देखो बहन, चंद्रमा निकल आया है, पूजन कर भोजन ग्रहण करो। बहन ने भोजन ग्रहण किया।
भोजन ग्रहण करते ही उसके पति की मृत्यु हो गई। अब वह दु:खी हो विलाप करने लगी, तभी वहाँ से रानी इंद्राणी निकल रही थीं। उनसे उसका दु:ख न देखा गया। ब्राह्मण कन्या ने उनके पैर पकड़ लिए और अपने दु:ख का कारण पूछा, तब इंद्राणी ने बताया- तूने बिना चंद्र दर्शन किए करवा चौथ का व्रत तोड़ दिया इसलिए यह कष्ट मिला।
अब तू वर्ष भर की चौथ का व्रत नियमपूर्वक करना तो तेरा पति जीवित हो जाएगा। उसने इंद्राणी के कहे अनुसार चौथ व्रत किया तो पुन: सौभाग्यवती हो गई। इसलिए प्रत्येक स्त्री को अपने पति की दीर्घायु के लिए व्रत करना चाहिए। द्रोपदी ने यह व्रत किया और अर्जुन सकुशल मनोवांछित फल प्राप्त कर वापस लौट आए। तभी से हिन्दू महिलाऍं अपने अखण्ड सुहाग के लिए करवा चौथ व्रत करती हैं।
करवा माता की आरती – ॐ जय करवा मैया – करवा चौथ की आरती
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