बसंत पंचमी पर्व
(पाप दोष मुक्ति, विद्या, ज्ञान और ललित कलाओं में दक्षता प्राप्ति के लिए)

बसंत पंचमी पर्व का माहात्म्य
यह दिवस ऋतुराज बसंत के आगमन का प्रथम दिन माना जाता है। हमारे धार्मिक ग्रंथों में बसंत को ऋतुरात अर्थात सब ऋतुओं का राजा माना गया है। बसंत पंचमी, बसंत ऋतु का एक प्रमुख त्यौहार है। इस प्रकार बसंत पंचमी का त्यौहार मानवमात्र के हृदय के आनंद और खुशी का प्रतीक कहा जाता है। बसंत ऋतु में जहां प्रकृति का सौदर्य निखर उठता है, वहीं उसकी अनुपम छटा देखते ही बनती है। यह पर्व उत्तरी भारत तथा पश्चिम बंगाल में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है।
होली का आरंभ भी बसंत पंचमी से ही होता है क्योंकि इस दिन प्रथम बार गुलाल उड़ाई जाती है। उत्तर प्रदेश में इसी दिन से फाग उड़ाना आरंभ करते हैं, जिसका अंत फाल्गुन की पूर्णिमा को होता है। भगवान श्रीकृष्ण इस त्यौहार के अधिदेवता हैं, इसलिए ब्रज प्रदेश में राधा तथा कृष्ण का आनंद-विनोद बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। इसी दिन किसान अपने नए अन्न में घी, गुड़ मिलाकर अग्नि तथा पितरों को तर्पण करते हैं।
ब्रह्मवैर्त पुराण के कथनानुसार भगवान् श्री कृष्ण ने इस दिन देवी सरस्ती पर प्रसन्न होकर उन्हें वरदान दिया था। इसीलिए विद्यार्थी तथा शिक्षा प्रेमियों के लिए यह माँ सरस्वती के पूजन का महान पर्व है। चरक संहिता में लिखा है कि इस ऋतु में स्त्री-रमण तथा करना चाहिए। कामदेव बसंत के अनन्य सहचर हैं। अतएव कमदेव रति की भी इस तिथि को पूजा करने का विघान है।
बसंत पंचमी पर्व की पूजन विधि-विधान
यह त्यौहार माद्य के शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाया जाता है। इस दिन नित्य के नैमित्तिक कार्य करके शरीर पर तेल से मालिश करें। फिर स्नान के बाद आभूषण धारण कर पीले वस्त्र पहनें। ब्राह्मणों को पीले चावल, पीले वस्त्र दान करने पर विशेष फल की प्राप्ति होती है। इस दिन विष्णु भगवान् के पूजन का माहात्म्य बताया गया है और ज्ञान की देवी सरस्वती के पूजन का विशेष विधान है। सरस्वती पूजन के पश्चात् शिशुओं को तिलक लगा कर अक्षर ज्ञान प्रारंभ कराने की भी प्रथा है। इस दिन ब्राह्मणों को भोजन कराकर यथाशक्ति दान-दक्षिणा दें।
बसंत पंचमी पर्व का पौराणिक संदर्भ
इसका उल्लेख ब्रह्मवैवर्त पुराण में इस प्रकार आया है – जब प्रजापति ब्रह्मा ने भगवान् विष्णु की आज्ञा से सृष्टि की रचना की तो वे उसे देखने के लिए निकले। उन्होंने सर्वत्र उदासी देखी। सारा वातावरण उन्हें ऐसा दिखा जैसे किसी के पास वाणी ही न हो। सुनसान, सन्नाटा, उदासी भरा वातावरण देखकर उन्होंने इसे दूर करने के लिए अपने कमंडल से चारों तरफ जल छिड़का।
जलकणों के वृक्षों पर पड़ने से वृक्षों से एक देवी प्रकट हुई, जिसके चार हाथ थे। उनमें से दो हाथों में वह वीणा पकड़े हुए थी तथा उसके शेष दो हाथों में से एक में पुस्तक और दूसरे में माला थी। संसार की मूकता और उदासी भरे वातावरण को दूर करने के लिए ब्रह्माजी ने इस देवी से वीणा बजाने को कहा। वीणा के मधुर स्वर नाद से जीवों को वाणी (वाक् शक्ति) मिल गई।
सप्तधि स्वरों का ज्ञान प्रदान करने के कारण ही इनका सरस्वती पड़ा। वीणावादिनी सरस्वती संगीतमय आह्लादित जीवन जीने की प्रेरणा है। वह विद्या, संगीत और बुद्धि की देवी मानी गई है, जिनकी पूजा-आराधना में मानव कल्याण का समग्र जीवन-दर्शन निहित है। इसीलिए बसंत पंचमी को इनका विधि-विधान से पूजन करने का नियम बनाया गया है।
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