अचला सप्तमी / सौर सप्तमी व्रत
(आरोग्यता, सूर्य ग्रह शांति और आत्मबल प्राप्ति के लिए)

अचला सप्तमी का माहात्म्य
ऐसा शास्त्र वर्णित है कि सूर्य नारायण के लिए अचला सप्तमी का व्रत करना चाहिए। इस दिन सूर्य भगवान् को गंगा जल से अर्ध्य दान करने का बड़ा माहात्म्य माना गया है। प्राचीन ज्योतिष शास्त्र और आधुनिक विज्ञान ने भी सूर्य को बड़ा महत्व दिया है, क्योंकि प्राणियों व वनस्पतियों को सूर्य से पोषण तथा वृद्धि प्राप्त होती है।
इसके अलावा सूर्य की किरणों में कीटाणुनाशक तत्व पर्याप्त मात्रा में मौजूद रहते हैं। सूर्य की ओर मुख करके जल का अर्ध्य दान करने से शारीरिक विकार नष्ट होते हैं। इस सप्तमी का स्नान मनुष्य के सभी मनोरथों की पूर्ति करने वाला होता है। व्रती की इसके प्रभाव से इस लोक के सभी वांछित भोगों को भोगने की इच्छा पूर्ण होती है और अंत में स्वर्ग में स्थान मिलता है। सप्तमी के दिन भूखे, गरीब, अपाहिज तथा ब्राह्मणों को दान देना परम पुण्यदायी माना गया है। इस व्रत का एक नाम और सप्तमी भी है।
अचला सप्तमी की पूजन विधि-विधान
यह व्रत माघ मास के शुक्ल पक्षा की सप्तमी को रखा जाता है। चूंकि यह व्रत स्त्रियों का है, इसलिए इसे वे सूर्य नारायण की प्रसन्नता के लिए रखती हैं। व्रती स्त्री को चाहिए कि षष्ठी के दिन केवल एक बार भोजन ग्रहण कर उसी दिन से सूर्य नारायण का विधि पूर्वक पूजन प्रारंभ कर दे। सप्तमी को प्रात: काल नित्यकर्मों से निवृत्त होकर किसी नदी या तालाब के किनारे कमर से ऊपर तक जल में खड़े होकर सिर पर दीप धारण करके सूर्य नारायण की ओर मुख करें, फिर स्तुति करके अर्घ्य पात्र में गंगाजल, रोली, अक्षत तथा रक्तवर्ण का पुष्प रखकर अर्घ्य दें।
नदी या तालाब के अभाव में घर पर ही स्नान कर भगवान् सूर्य की अष्टदली प्रतिमा बनाकर मध्य में भगवान् शिव तथा पार्वती की स्थापना करके विधि-विधानानुसार पूजन करें। सायंकाल प्रतिमा का विसर्जन किसी नदी या सरोवर में करें। ब्राह्मणों को भोजन कराकर तांबे के बर्तन में चावल भरकर, दक्षिणा डालकर ब्राह्मण को दान करें।
अचला सप्तमी की व्रत कथा
प्राचीन काल में इंदुमती नाम की एक रूपवती वेश्य थी। एक दिन वह महात्मा वसिष्ठ के आश्रम में पहुंची और हाथ जोड़कर प्रणाम करने के बाद कहने लगी- हे मुनिराज! मैंने आज तक कोई धार्मिक कार्य जैसे- दान, हवन, व्रत, उपवास या किसी भी तरह का भगवान् का पूजन कभी भक्ति से नहीं किया।
मैं हमेशा भौतिक सुखों को भोगने में लगी रही। अब भव-सागर से मेरी मुक्ति कैसे होगी, यही चिंता मुझे हर समय विदग्ध किए रहती है। कृपाकर आप मुझे कोई ऐसा व्रत, दान आदि कर्म बताएं जिसके अनुष्ठान से मुझे मोक्ष प्राप्त हो सके। उस वेश्या के बार-बार प्रार्थना करने पर दयावश मुनिराज वसिष्ठ बोले- मुम माघ शुक्ल सप्तमी के दिन स्नान कर अचला सप्तमी का व्रत करो।
इसके प्रभाव से मुक्ति, सौभाग्य, सौंदर्य सारे मनोरथ पूरे होंगे। व्रत के लिए छठ के दिन एक बार भोजन कर दूसरे दिन प्रात:काल उठाकर किसी ऐसे जलाशय में जाकर स्नान करो, जिसमें पहले किसी के न होने से पानी हिलता न हो। ऐसा करने से तुम्हारे सारे पाप दूर हो जाएंगे। वसिष्ठ के कथानुसार उस वेश्या ने विधि-विधान से स्नान कर व्रत किया और दान दिया तो वह इस लोक के सब वांछित भोगों को भोग कर अंत में स्वर्ग चली गई।
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