सोमवार त्रयोदशी
(सौम्य प्रदोष) व्रत कथा

सोमप्रदोष का वर्णन
शिवपूजा सदा लोके हेतुः स्वर्गापवर्गयोः ।
सोमवारे विशेषेण प्रदोषादिगुणान्विते ॥ ॥१॥
केवलेनापि ये कुर्युः सोमवारे शिवार्चनम् ।
न तेषां विद्यते किंचिदिहामुत्र च दुर्लभम् ॥ ॥२॥
उपोषितः शुचिर्भूत्वा सोमवारे जितेंद्रियः ।
वैदिकैलौकिकैर्वापि विधिवत्पूजयेच्छिवम् ॥ ॥३॥
ब्रह्मचारी गृहस्थो वा कन्या वापि सभर्तृका ।
विभर्तृका वा संपूज्य लभते वरमीप्सितम् ॥ ॥ ४ ॥ स्कन्द-पुराण
संसार में भगवान शिव की पूजा सदा ही स्वर्ग और मोक्ष का हेतु है। यदि सोमप्रदोष के दिन यह पूजा की जाए तो उसका विशेष महात्म्य है। जो सोमवार को भगवान शंकर की पूजा करते हैं, उनके लिए इहलोक और परलोक में कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं। सोमवार को उपवास करके इंद्रियों को वश में रखते हुए वैदिक अथवा लौकिक मंत्रों से विधिपूर्वक भगवान शिव की पूजा करनी चाहिए। ब्रह्मचारी, गृहस्थ, कन्या, सुहागिन स्त्री अथवा विधवा कोई भी क्यों न हो, भगवान शिव की पूजा करके मनोवांछित वर पाता है।
मत्स्वरुपो यतो वारस्ततः सोम इति स्मृतः ।
प्रदाता सर्वराज्यस्य श्रेष्ठश्चैव ततो हि सः ।
समस्तराज्यफलदो वृतकर्तुर्यतो हि सः ॥
सोमवार मेरा ही स्वरूप है, अतः इसे सोम कहा गया है। इसीलिये यह समस्त राज्य का प्रदाता तथा श्रेष्ठ है। व्रत करने वाले को यह सम्पूर्ण राज्य का फल देने वाला है।
सोमे मत्पूजा नक्तभोजनं ।
अर्थात सोमवार को शिव पूजा और नक्तम् (रात्रि) भोजन करना चाहिए।
कृष्णे नाचरितं पूर्वं सोमवार व्रतं शुभम् ।
पूर्वकाल में सर्वप्रथम श्रीकृष्ण ने ही इस मंगलकारी सोमवार व्रत को किया था।
निशि यत्नेन कर्तव्यंभोजनं सोमवासरे ।
उभयोः पक्षयोर्विष्णो सर्वस्मिञ्छिव तत्परैः॥ शिवपुराण, कोटिरुद्रसंहिता
यानी दोनों पक्षों में प्रत्येक सोमवार को प्रयत्न पूर्वक केवल नक्तम् भोजन (रात में ही भोजन) करना चाहिए। शिव के व्रत में तत्पर रहने वाले लोगों के लिए यह अनिवार्य नियम है।
अष्टमी सोमवारे च कृष्णपक्षे चतुर्दशी ।
शिवतुष्टिकरं चैतन्नात्र कार्या विचारणा ॥
सोमवार की अष्टमी तथा कृष्णपक्ष चतुर्दशी इन दो तिथियों को व्रत रखा जाए तो वह भगवान शिव को संतुष्ट करने वाला होता है, इसमें अन्यथा विचार करने की आवश्यकता नहीं है।
सोमवार को प्रदोष का व्रत रखने के फायदे
- सोम प्रदोष के दिन निर्जला व्रत रखने से मन मुताबिक फल मिलता है।
- सोमवार शिवजी का दिन है इस दिन शिव-पार्वती की पूजा से प्रदोष फल दोगुना हो जाता है।
- संतान प्राप्ति की मनोकामना से भी यह व्रत रखा जाता है।
- सोम प्रदोष व्रत से कुंडली में चंद्रमा, शुक्र एवं बुध का नकारात्मक असर कम होता है। कुल मिलाकर इससे मानसिक बैचेनी खत्म होती है। व्यक्ति के सौभाग्य और आयु में वृद्धि होती है।
- रवि प्रदोष, सोम प्रदोष व शनि प्रदोष के समस्त त्रयोदशी के व्रत को यदि कोई भी 11 अथवा एक वर्ष के करता है तो उसकी समस्त मनोकामनाएं अवश्य और शीघ्रता से पूर्ण होती है।
सोम प्रदोष व्रत कथा
सूत जी बोले- हे ऋषिवरों! अब मैं सोम त्रयोदशी व्रत का महात्म्य वर्णन करता हूँ। इस व्रत के करने से शिव पार्वती प्रसन्न होते हैं। प्रातः स्नानादि कर शुद्ध पवित्र हो शिव पार्वती का ध्यान करके पूजन करें और अर्घ्य दें। “ओ३म् नमः शिवाय” इस मन्त्र का १०८ बार जाप करें फिर स्तुति करें- हे प्रभो! मैं इस दुःख सागर में गोते खाता हुआ ऋण भार से दबा, ग्रहदशा से ग्रसित हूँ, हे दयालु! मेरी रक्षा कीजिए।
शौनकादि ऋषि बोले – हे पूज्यवर महामते, आपने यह व्रत सम्पूर्ण कामनाओं के लिए बताया है, अब कृपा कर यह बताने का कष्ट करें कि यह व्रत किसने किया व क्या फल पाया?
सूत जी बोले – एक नगर में एक ब्राह्मणी रहती थी। उसके पति का स्वर्गवास हो गया था। कोई भी उसका धीर धेरैया न था। इसलिए वह सुबह होते ही वह अपने पुत्र के साथ भीख माँगने निकल जाती और जो भिक्षा मिलती उसी से वह अपना अपने पुत्र का पेट भरती थी।
एक दिन ब्राह्मणी भीख माँग कर लौट रही थी तो उसे एक लड़का मिला, उसकी दशा बहुत खराब थी। ब्राह्मणी को उस पर दया आ गई। वह उसे अपने साथ घर ले आई।
वह लड़का विदर्भ का राजकुमार था। पड़ौसी राजा ने उसके पिता पर आक्रमण करके उसके राज्य पर कब्जा कर लिया था। इसलिए वह मारा-मारा फिर रहा था। ब्राह्मणी के घर पर वह ब्राह्मण कुमार के साथ रहकर पलने लगा। एक दिन ब्राह्मण कुमार और राजकुमार खेल रहे थे। उन्हें वहाँ गन्धर्व कन्याओं ने देख लिया। वे राजकुमार पर मोहित हो गई। ब्राह्मण कुमार तो घर लौट आया लेकिन राजकुमार अंशुमति नामक गन्धर्व कन्या से बात करता रह गया। दूसरे दिन अंशुमति अपने माता-पिता को राजकुमार से मिलाने के लिए ले आई। उनको भी राजकुमार पसन्द आया। कुछ ही दिनों बाद अंशुमति के माता-पिता को शंकर भगवान ने स्वप्न में आदेश दिया कि वे अपनी कन्या का विवाह राजकुमार से कर दें। फलतः उन्होंने अंशुमति का विवाह राजकुमार से कर दिया।
ब्राह्मणी को ऋषियों ने आज्ञा दे रखी थी कि वह सदा प्रदोष व्रत करती रहे। उसके व्रत के प्रभाव और गन्धर्वराज की सेनाओं की सहायता से राजकुमार ने विदर्भ से शत्रुओं को मार भगाया और अपने पिता के राज्य को पुनः प्राप्त कर वहाँ आनन्दपूर्वक रहने लगा। राजकुमार ने ब्राह्मण कुमार को अपना प्रधानमंत्री बनाया।
राजकुमार और ब्राह्मण कुमार के दिन जिस प्रकार ब्राह्मणी के प्रदोष व्रत की कृपा से फिरे, उसी प्रकार शंकर भगवान अपने दूसरे भक्तों के दिन भी फेरते हैं। तभी से प्रदोष व्रत का संसार में बड़ा महत्त्व है।
शौनक ऋषि सूत जी से बोले – कृपा करके अब आप मंगल प्रदोष की व्रत कथा का वर्णन कीजियेगा।
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