श्री दुर्गा नवरात्र व्रत कथा

।। श्री गणेशाय नमः ।।
।। घट स्थापना दुर्गा पूजन सामग्री ।।
गंगाजल, रोली, मौली, पान, सुपारी, धूपबत्ती, घी का दीपक, फल, फूल की माला, विल्वपत्र, चावल, केले का खम्भा, बन्द्रनवार के वास्ते आम के पत्ते, चन्दन, घट, नारियल, सूर्योषधि हल्दी की गांठ, पंचरत्न, लाल वस्त्र, पूर्ण पात्र (चावल से भरा पात्र), गंगा की मृत्तिका, जौं, (जव), बताशा, सुगन्धित तेल, सिन्दूर, कपूर, पंच सुगन्ध, नैवेद्य के वास्ते फल इत्यादि (पंचामृत), दूध, दही, मधु, चीनी (पंचगव्य), गाय का गोबर, गोमूत्र, गो दूध, गो रही, गो घृत, दुर्गा जी की स्वर्ण मूर्ति अथवा मृत्तिका की प्रतिमा, कुमारी पूजन के लिए वस्त्र, आभूषण तथा नैवेद्यादि, अष्टमी में ज्योति पूजन के वास्ते, उपरोक्त सामग्री। डाभ घृत, गंगाजल।
।। व्रत करने की विधि ।।
इस व्रत में उपवास या फलाहार आदि का कोई विशेष नियम नहीं। प्रातःकाल उठकर स्नान करके, मन्दिर में जाकर या घर पर ही नवरात्रों में दुर्गा जी का ध्यान करके यह कथा पढ़नी चाहिए। कन्याओं के लिए यह व्रत विशेष फलदायक है। श्री जगदम्बा की कृपा से सब विघ्न दूर होते हैं। कथा के अन्त में बारम्बार “दुर्गा माता तेरी सदा जय हो” का उच्चारण करें।
।। कथा प्रारम्भ ।।
बृहस्पति जी बोले-हे ब्रह्मा जी ! आप अत्यन्त बुद्धिमान, सर्वशास्त्र और चारों वेदों को जानने वालों में श्रेष्ठ हो। हे प्रभु! कृपा कर मेरा वचन सुनो। चैत्र, आश्विन, माघ और आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष में नवरात्र का व्रत और उत्सव क्यों किया जाता है? हे भगवन्! इस व्रत का फल क्या है? किस प्रकार करना उचित है और पहले इस व्रत को किसने किया? सो विस्तार से कहो।
बृहस्पति जी का ऐसा प्रश्न सुनकर ब्रह्मा जी कहने लगे कि हे बृहस्पति! प्राणियों का हित करने की इच्छा से तुमने बहुत ही अच्छा प्रश्न किया। जो मनुष्य मनोरथ पूर्ण करने वाली दुर्गा, महादेवी, सूर्य और नारायण का ध्यान करते हैं, वे मनुष्य धन्य हैं, यह नवरात्र व्रत सम्पूर्ण कामनाओं को पूर्ण करने वाला है।
इसके करने से पुत्र चाहने वाले को पुत्र, धन चाहने वाले को धन, विद्या चाहने वाले को विद्या और सुख चाहने वाले को सुख मिल सकता है। इस व्रत को करने से रोगी मनुष्य का रोग दूर हो जाता है और कारागार हुआ मनुष्य बन्धन से छूट जाता है। मनुष्य की तमाम आपत्तियां दूर हो जाती हैं और उसके घर में सम्पूर्ण सम्पत्तियां आकर उपस्थित हो जाती हैं। बन्ध्या और काक बन्ध्या के इस व्रत के करने से पुत्र हो जाता है। समस्त पापों को दूर करने वाले इस व्रत के करने से ऐसा कौन-सा मनोरथ है जो सिद्ध नहीं हो सकता। जो मनुष्य इस आलभ्य मनुष्य देह को पाकर भी नवरात्र का व्रत नहीं करता वह माता-पिता हीन हो जाता है। अर्थात् उसके माता-पिता मर जाते हैं और अनेक दुःखों को भोगता है। उसके शरीर में कुष्ठ हो जाता है और अंगहीन हो जाता है, उसके सन्तानोत्पत्ति नहीं होती। इस प्रकार वह मूर्ख अनेक दुःख भोगता है। इस व्रत को न करने वाला निर्दयी मनुष्य धन और धान्य से रहित हो, भूख और प्यास के मारे पृथ्वी पर घूमता रहता है और गूंगा हो जाता है। जो सुहागिन स्त्री भूल से इस व्रत को नहीं करती वह पति से हीन होकर नाना प्रकार के दुःखों को भोगती है।
यदि व्रत करने वाले मनुष्य सारे दिन का उपवास न कर सकें तो एक समय भोजन करें और उस दिन बान्धवों सहित नवरात्र की कथा का श्रवण करें।
हे बृहस्पते! जिसने पहले इस महाव्रत को किया है उसका पवित्र इतिहास मैं तुम्हें सुनाता हूं। तुम सावधान होकर सुनो। इस प्रकार ब्रह्मा जी के वचन सुनकर बृहस्पति जी बोले-हे ब्राह्मण! मनुष्य का कल्याण करने वाले इस व्रत के इतिहास को मेरे लिए कहो मैं सावधान होकर सुन रहा हूं। आपकी शरण आये हुए मुझ पर कृपा करो।
ब्रह्मा जी बोले- पीठत नाम के मनोहर नगर में एक अनाथ नाम का ब्राह्मण रहता था। वह भगवती दुर्गा का भक्त था। उसके सम्पूर्ण सद्गुणों से युक्त मानो ब्रह्मा की सबसे पहली रचना हो ऐसी यथार्थ नाम वाली सुमति नाम की एक अत्यन्त सुन्दर कन्या पैदा हुई। वह कन्या अपने घर में बालकपन में अपनी सहेलियों के साथ क्रीड़ा करती हुई इस प्रकार बढ़ने लगी जैसे शुक्ल पक्ष में चन्द्रमा की कला बढ़ती है। उसका पिता प्रति दिन दुर्गा पूजा और होम किया करता था। उस समय वह भी नियम से वहां उपस्थित होती थी। एक दिन वह सुमति अपनी सखियों के साथ खेलने लग गई और भगवती के पूजन में उपस्थित नहीं हुई। उसके पिता को पुत्री की ऐसी असावधानी देखकर क्रोध आया और पुत्री से कहने लगा कि हे दुष्ट पुत्री! आज प्रभात से तुमने भगवती का पूजन नहीं किया, इस कारण मैं किसी कुष्ठी और दरिद्री मनुष्य के साथ तेरा विवाह करूंगा। इस प्रकार कुपित पिता के वचन सुनकर सुमति को बड़ा दुःख हुआ और पिता से कहने लगी कि पिताजी! मैं आपकी कन्या हूं। मैं आपके सब तरह से आधीन हूं जैसी आप की इच्छा हो वैसा ही करो। रोगी कुष्ठी अथवा और किसी के साथ जैसी तुम्हारी इच्छा हो मेरा विवाह कर सकते हो. होगा वही जो मेरे भाग्य में लिखा है। मेरा तो इस पर पूर्ण विश्वास है।
मनुष्य न जाने कितने मनोरथों का चिन्तन करता है पर होता वही हो जो भाग्य में विधाता ने लिखा है जो जैसा करता है उसको फल भी उस कर्म के अनुसार ही मिलता है, क्योंकि कर्म करना मनुष्य के अधीन है पर फल देव के आधीन है। जैसे अग्नि में पड़े हुए तृणादि उसको अधिक प्रदीप्त कर देते हैं उसी तरह अपनी कन्या के ऐसे निर्भयता से कहे हुए वचन सुनकर उस ब्राह्मण को अधिक क्रोध आया। तब उसने अपनी कन्या का एक कुष्ठी के साथ विवाह कर दिया और अत्यन्त क्रुद्ध होकर पुत्री से कहने लगा कि जाओ जल्दी जाओ अपने कर्म का फल भोगो। देखें केवल भाग्य भरोसे पर रहकर क्या करती है?
इस प्रकार से कहे हुए पिता के कटु वचनों को सुनकर सुमति अपने मन में विचार करने लगी कि अहो! मेरा बड़ा दुर्भाग्य है जिससे मुझे ऐसा पति मिला। इस तरह अपने दुःख का विचार करती हुई वह सुमति अपने पति के साथ बन चली गई और भयावने कुशायुक्त उस स्थान पर उन्होंने वह रात बड़े कष्ट से व्यतीत की। उस गरीब बालिका की ऐसी दशा देखकर भगवती पूर्व पुण्य के प्रभाव से प्रकट होकर सुमति से कहने लगी कि हे दीन ब्राह्मणी! मैं तुम पर प्रसन्न हूं, तुम जो चाहो वरदान मांग सकती हो। मैं प्रसन्न होने पर मनवांछित फल देने वाली हूं। इस प्रकार भगवती दुर्गा का वचन सुनकर ब्राह्मणी कहने लगी कि आप कौन हैं जो मुझ पर प्रसन्न हुई हो यह सब मेरे लिए कहो और अपनी कृपा दृष्टि से मुझ दीन-दासी को कृतार्थ करो।
ऐसा ब्राह्मणी का वचन सुन देवी कहने लगी कि मैं आदि शक्ति हूं और मैं ही ब्रह्मा और सरस्वती हूं। मैं प्रसन्न होने पर प्राणियों का दुःख दूर कर उनको सुख प्रदान करती हूं। हे ब्राह्मणी ! मैं तुम पर तेरे पूर्व जन्म के पुण्य के प्रभाव से प्रसन्न हूं।
तुम्हारे पूर्व जन्म का वृतान्त सुनाती हूं। सुनो! तू पूर्व जन्म में निषाद (भील) की स्त्री थी और अति पतिव्रता थी। एक दिन तेरे पति निषाद ने चोरी की। चोरी करने के कारण तुम दोनों को सिपाहियों ने पकड़ लिया और ले जाकर जेलखाने में कैद कर दिया उन लोगों ने तेरे को और तेरे पति को भोजन भी नहीं दिया। इस प्रकार नवरात्र के दिनों में तुमने न तो कुछ खाया और न जल ही पिया। इसलिए नौ दिन तक नवरात्र का व्रत हो गया।
हे ब्राह्मणी! उन दिनों में जो व्रत हुआ उस व्रत के प्रभाव से प्रसन्न होकर तुम्हें मनोवांछित वस्तु दे रही हूं तुम्हारी इच्छा हो सो मांगो। इस प्रकार दुर्गा के कहे हुए वचनों को सुनकर ब्राह्मणी बोली कि अगर आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो हे दुर्गे! आपको प्रणाम करती हूं। कृपा करके मेरे पति के कोढ़ को दूर करो। देवी कहने लगी कि उन दिनों में जो तुम व्रत किया था उस व्रत के एक दिन का पुण्य अपने पति का कोढ़ दूर होने के लिए अर्पण करो मेरे प्रभाव से तेरा पति कोढ़ से रहित और सोने के समान शरीर वाला हो जायेगा। ब्रह्मा जी बोले इस प्रकार देवी का वचन सुनकर वह ब्राह्मणी बहुत प्रसन्न हुई और अपने पति को निरोग करने की इच्छा से ठीक है, ऐसे बोली। तब तक उसके पति का शरीर भगवती दुर्गा की कृपा से कुष्ठहीन होकर अति कान्तियुक्त हो गया, जिसकी कान्ति के सामने चन्द्रमा की कान्ति भी क्षीण हो जाती है। वह ब्राह्मणी पति की मनोहर देह को देखकर देवी को अति पराक्रमी वाली समझ कर स्तुति करने लगी कि हे दुर्गे! आप दुर्गत को दूर करने वाली, प्रसन्न होने पर मनवांछित वस्तु देने वाली और दुष्ट मनुष्य का नाश करने वाली हो। तुम ही सारे जगत की माता और पिता हो। हे अम्बे! मुझ अपराध रहित अबला मेरे पिता ने कुष्ठा के साथ विवाह कर मुझे घर से निकाल दिया। उसकी निकाली हुई पृथ्वी पर घूमने लगी। आपने ही मेरा आपत्ति रूपी समुद्र से उद्धार किया है। हे देवी! आपको प्रणाम करती हूं। मुझ दीन की रक्षा करो।
ब्रह्मा जी बोल कि हे बृहस्पते! इसी प्रकार उस सुमति ने मन से देवी की बहुत स्तुति की, उससे कि हुई स्तुति सुनकर देवी को बहुत सन्तोष हुआ और ब्राह्मणी से कहने लगी कि हे ब्राह्मणी! उदायल नाम का अति बुद्धिमान, धनवान, कीर्तिवान और जितेन्द्रिय पुत्र शीघ्र ही होगा। ऐसा कहकर वह देवी उस ब्राह्मणी से फिर कहने लगी कि हे ब्राह्मणी और जो कुछ तेरी इच्छा हो वही मनवांछित वस्तु मांग सकती है ऐसा भगवती के वचन सुनकर सुमति बोली कि हे भगवती दुर्गे! अगर आप मेरे पर प्रसन्न हैं तो कृपा कर मुझे नवरात्रि विधि बताइए।
हे दयावती! जिस विधि से नवरात्र व्रत करने से आप प्रसन्न होती हैं उस विधि और उसके फल को मेरे लिए विस्तार से वर्णन करें। इस प्रकार ब्राह्मणी के वचन सुनकर दुर्गा कहने लगी कि हे ब्राह्मणी! मैं तुम्हारे लिए सम्पूर्ण पापों को दूर करने वाली नवरात्र व्रत की विधि को बतलाती हूं। जिसको सुनने से तमाम पापों से छूटकर मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। आश्विन मास के शुक्लपक्ष की प्रतिपदा से लेकर नौ दिन तक विधि पूर्वक व्रत करें। यदि दिन भर व्रत न कर सकें तो एक समय का भोजन करें। पढ़े लिखे ब्राह्मणों से पूछकर घट स्थापना करें और वाटिका बनाकर उसको प्रतिदिन जल से सीचें। महाकाली, महालक्ष्मी और सरस्वती इनकी मूर्तियां बनाकर उनकी नित्य विधि सहित पूजा करें और पुष्पों से विधि पूर्वक अर्ध्य दें। बिजौरा के फूल से अर्घ्य देने से रूप की प्राप्ति होती है। जायफल से कीर्ति, दाख से कार्य की सिद्धि होती है। आंवले से सुख और केले से भूषण की प्राप्ति होती हे। इस प्रकार फलों से अर्घ्य देकर यथा विधि हवन करें। खांड, घी, गेहूं, जौं, तिल, बिम्ब, नारियल, दाख और कदम्ब इनसे हवन करें। गेहूं होम करने से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। खीर व चम्पा के पुष्पों से धन और पत्तों से तेज और सुख की प्राप्ति होती है। आंवले से कीर्ति और केले से पुत्र होय। कमल से राज सम्मान और दाखों से सुख सम्पत्ति की प्राप्ति होती है। खांड, घी, नारियल, शहद, जौं और तिल इनसे तथा फलों से होम करने से मनवांछित वस्तु की प्राप्ति होती है। व्रत करने वाला मनुष्य इस विधान से हीम कर आचार्य को अत्यन्त नम्रता के साथ प्रणाम करे और यज्ञ की सिद्धि के लिए उसे दक्षिणा दे। इस महाव्रत को पहले बताई हुई विधि के अनुसार जो कोई करता है, उसके सब मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं, इनमें तनिक भी संशय नहीं है। इन नौ दिनों में जो कुछ दान आदि दिया जाता है, उसका करोड़ों गुना मिलता है। इस नवरात्र के व्रत करने से अश्वमेघ यज्ञ का फलं मिलता है। हे ब्राह्मणी! इस सम्पूर्ण कामनाओं को पूर्ण करने वाले उत्तम व्रत को तीर्थ, मन्दिर अथवा घर में ही विधि के अनुसार करें, ब्रह्मा जी बोले कि बृहस्पते! इस प्रकार ब्राह्मणी को व्रत की विधि और फल बताकर देवी अर्न्तध्यान हो गई।
जो मनुष्य या स्त्री इस व्रत को भक्ति पूर्वक करता है वह इस लोक में सुख पाकर अन्त में दुलर्भ मोक्ष को प्राप्त होता है। हे बृहस्पते! यह दुलर्भव्रत का महात्म्य मैंने तुम्हारे लिए बतलाया है। ऐसा ब्रह्मा जी के वचन सुनकर बृहस्पति जी आनन्द के कारण रोमांचित हो गए और ब्रह्मा जी से कहने लगे कि हे ब्रह्मा जी! आपने मुझ पर अधि कृपा की जो अमृत के समान इस नवरात्रि व्रत का महात्म्य सुनाया। हे प्रभो! आपके बिना और कौन इस महात्म्य को सुना सकता है? ऐसे बृहस्पति जी के वचन सुनकर ब्रह्मा जी बोले कि हे बृहस्पते! तुमने सब प्राणियों का हित करने वालों इस अलौकिक व्रत को पूछा है। इसलिए तुम धन्य हो। यह भगवति शक्ति सम्पूर्ण लोकों का पालन करने वाली है, इस महादेवी के प्रभाव को कौन जान सकता है।
।। दुर्गा (सप्तशती) हवन विधान ।।
हवन विधिन जानने के लिए कृपया नीचे दिये गये लिंक पर क्लिक करें
दुर्गा सप्तशती हवन विधान विधि एवं मंत्र सहित।
