मंगलम्
नमः शिवाय शान्ताय शुद्धाय शूलधारिणे ।
नमस्ते शक्तियुक्ताय मंगलाय च वै नमः ॥

ब्रह्माजी ने नारदजी से कहा- हे नारद! शिवजी के असंख्य व्रत हैं। भुक्ति और मुक्ति दोनों को देते हैं। उन व्रतों को अवश्य करना चाहिये । निम्नांकित व्रत अवश्य सिद्धिप्रद हैं। ये १२ व्रत शिवजीको अतिप्रिय हैं। अष्टमी, दोनों पक्ष की एकादशी, दोनों पक्ष की त्रयोदशी, दोनों चतुर्दशी, एक महीने में जितने सोमवार पड़े, ये सब मिलकर १२ व्रत हैं। अष्टमी को फलाहार करे, एकादशी को निर्जला व्रत करे । दोनों त्रयोदशी में एक बार भोजन करे । कृष्ण पक्ष की एकादशी को एक भुक्त व्रत करे । शुक्ल पक्ष के चतुर्दशी को भी एक भुक्त व्रत करे । कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को निर्जला व्रत करे। दिन एवं रात के सभी पहरों में शिवजी की पूजा करे। सोमवार को शक्ति सहित शिव की पूजा करे । उपरोक्त व्रतों में शिवजी के भक्तों को भोजन देवे । शक्ति के अनुसार दान देवे । इन व्रतों में जो मनुष्य एक भी व्रत नहीं करता, उस पतित के ऊपर शिवजी कभी प्रसन्न नहीं होते। वह मनुष्य दोनों लोकों में दुःखी रहता है। उपरोक्त व्रतों में यदि महीने में एक भी व्रत करता है, वह भो उत्तम है।
ब्रह्माजी ने कहा- हे नारद! चार चोजें भुक्ति और मुक्ति देनेवाली हैं- रुद्र जाप, शिवपूजा, शिव का व्रत तथा काशी में मरना। ये चारों शिवजी को परमप्रिय हैं तथा संसार में मनुष्य को बड़ा सुख देनेवाले हैं । उपरोक्त व्रतों में शिवरात्रि का सबसे अधिक महत्त्व है।
शिवरात्रि व्रत महात्म्य
नभो वर्ण-आश्रम तथा जाति के लोग इस व्रत को कर सकते हैं। बाल, युवा तथा स्त्रियाँ भी कर सकती हैं। यह व्रत सकाम-निष्काम दोनों के लिए विहित है। इस व्रत से शिवलोक मिलता है। यह व्रत असंख्य हत्याओं को मिटाने वाला है। असंख्य पुण्यों को देने वाला है। इसकी महिमा का वर्णना शेषनाग और शारदा नहीं कर सकतीं । इस व्रत को करने वालों को मुक्ति मिलती है। इसे व्रतराज कहते हैं। सब व्रत इसको सिर झुकाये रहते हैं। शिवजी को यह व्रत पार्वती के समान प्रिय है।
यज्ञदत्त ब्राह्मण के पुत्र गुणनिधि और स्त्री सुर्मात तथा व्याध आदि ने अनजान में इसी व्रत को करके उत्तम गति पायी है। यह व्रत प्रत्येक महीने की शिवरात्रि (चतुर्दशी) कृष्ण पक्ष को होता है, किन्तु माघ के महीने में इसको करना अति आवश्यक है। इसी प्रकार फाल्गुन मास की चतुर्दशी भी है। यह शिवरात्रि सर्वोत्तम कही गयी है। आधी रात तक जो तिथि हो, वही शिवरात्रि व्रत के लिए उत्तम है। शिवरात्रि व्रत करके उसी दिन पारण करे तो उत्तम है, किन्तु बड़े भाग्य से उसी दिन ‘पारण’ मिलता है। चतुर्दशी न मिले तो आमावस्या को भी पारण कर सकते हैं। जो मनुष्य दुर्लभ शिवरात्रि व्रत को नहीं करता, वह घोर नरक में जाता है। शिवरात्रि व्रत करने वालों को देखकर यमराज भी भयभीत रहते हैं। जो शिवरात्रि का व्रत करता है, वह शिव का गण है।
शिव जी के चारों प्रहर की पूजा विधि
हे नारद! अब में चारों प्रहरों की पूजा का वर्णन करता हूँ, सुनो -प्रातःकाल उठकर नित्य कर्म करे और अति प्रसन्नता से शिवजी के मन्दिर में जाकर स्तुति करे। पहले परम पवित्रता के साथ जल हाथ में लेकर इस प्रकार संकल्प करे – हे शिवजी मे आपका व्रत करूंगा, वह पूर्ण हो और कोई उसमें विघ्न न हो। फिर पूजन सामग्री एकत्र करके प्रसिद्ध शिवलिङ्ग के समीप जाय, शिवजी के दक्षिण या पश्चिम की ओर आसन लगाकर पूजा की सामग्री रखे। पवित्रता के साथ तीन बार आचमन करके पूजा करे। यथा विधिमन्त्रोच्चारणपूर्वक पूजन करे। नाच-गान आदि के साथ स्तुति करे और शिवजी का मन्त्र जपे। यथाविधि प्रणाम करे। मन्त्रों के साथ पार्थिव पूजा भी करे। जो मनुष्य जिस देवता का पूजन करता है, उस देवता के पूजन के बाद पार्थिव पूजा करे। पुनः स्थापित शिवलिङ्ग का पूजन करे। शिवरात्रि की महिमा स्वयं पढ़े । स्वयं नहीं पढ़ पावे तो दूसरे से सुने। कथावाचक की नाना विधि से पूजन करे। अच्छे-अच्छे नैवेद्य शिवजी को भोग लगाकर चारों प्रहर में संकल्प करके शिवलिङ्ग की पूजा करे। रात्रि जागरणपूर्वक उत्सव करे । सबेरे भी स्नान करके पूजन करे, गाल बजावे, नाचे, वारम्बार दण्डवत करे और स्तुति करे। सिरझुकावे बिनती करे कि मैंने शिवरात्रि व्रत किया, यथा शक्ति उद्योग किया तथा प्रेम से आपमें मन लगाया है, मुझे सेवक जानकर प्रसन्न होकर मेरा मनोरथ पूर्ण करें। शिवजी को निल्वपत्र अति प्रिय है, अतः अधिक से अधिक मात्रा में चढ़ावे । ऐसा करते हुए शिवजी को पुष्पाञ्जलि समर्पण करे। ब्राह्मणों को दान दे। शिवभक्तों को, द्विजों को तथा यति सन्यासियों को उत्तमोत्तम भोजन करावे। शक्ति के अनु-सार दक्षिणा (विदाई) से प्रसन्न करे। शिवजी का ध्यान करते हुए ब्राह्मणों से आशीर्वाद लेकर पूर्ण होने पर स्वयं भी भोजन करे। धनवान् हो तो अधिक से अधिक धन खर्च करे। इस प्रकार से प्रतिमास शिवरात्रि का पूजन तथा उद्यापन करना चाहिए।
शिवरात्रि व्रत का उद्यापन
शिवरात्रि व्रत के उद्यापन करने से सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं। शिवरात्रि व्रत चौदह वर्ष तक बराबर करके तब विशेष रूप से उद्यापन करे। त्रयोदशी के दिन संयमपूर्वक रहे, चतुर्दशी को अन्न जल रहित व्रत करे। शिवजी का दिव्य धाम (मण्डल) जिसको ‘गौरी तिलक’ कहते हैं, उसे बनावे, वहाँ पर लिङ्गतोभद्र तथा सर्वतोभद्र बनावे। आठ कलशों को स्थापित करे, फलफूल तथा वस्त्रों से पूर्ण करे, उसके मध्य में एक स्वर्ण कलश रखे, जिसके ऊपर शिव-पार्वती नन्दीश्वर की स्वर्ण की प्रतिमा बनाकर स्थापना करे। शक्ति के अनुसार मूर्ति बनावे, दीप जलाकर दाहिनी तरफ रखे । प्रसन्न मन से रात्रि भर जागरण करे, चारों प्रहरों में पूजा करे। ब्राह्मणों की भी पूजा करके प्रसन्न करे। भोजन करावे, वस्त्र आभूषणों का दान करे । विशेष पूजा आचार्यजी का करे। उन्हें गोदान दे। तीनों सुवर्ण की मूर्तियाँ अन्य सामग्री सहित देकर दण्डवत् प्रणाम करे। शिवजी को पुष्पाञ्जलि चढ़ा कर स्तुति सहित दण्डवत् प्रणाम करे। फिर परिवार सहित ब्राह्मणों की आज्ञा से व्रत पूर्ण करके भोजन करे।
महत्त्व जाने बिना भी शिवरात्रि व्रत करने का फल
प्राचीनकाल में एक व्याध हुआ, उसका नाम निषाद था। वह बड़ा हिंसक था। परिवार सहित रहता था। वनके जीवों को मारता था, धन चोरी करके ले आता था । इस प्रकार बहुत समय बिता। एक दिन घर में भोजन की कोई सामग्री न होने से उसके परिवार ने क्षुधा से व्याकुल होकर कहा कि हमारे लिए भोजन सामग्री ले आओ। यह सुनकर व्याध धनुष बाण लेकर वन की ओर गया। उस दिन महाशिवरात्रि थी। इस व्रत को निषाद नहीं जानता था। उस दिन निषाद को कोई शिकार नहीं मिला। जब रात्रि हुई तब वह दुःखी होकर सोचने लगा अब मैं घर नहीं जाऊँगा। रात्रि में जलाशय के किनारे जल पीने के लिये कोई जन्तु अवश्य आयेगा, उसको मार करके घर ले जाऊँगा। सब परिवार को भोजन कराऊँगा। यह शोचकर वह निषाद एक विल्व के वृक्ष पर चढ़ गया और छिप कर हरिणों की प्रतिक्षा करने लगा। उस रात्रि के प्रथम प्रहर में एक हरिणी प्यासी हुई वहाँ जल पीने आई। निषाद ने तुरन्त उसको मारने के लिये धनुष पर बाँण चढ़ाया। उस समय उस निषाद के शरीर के रगड़ से विल्व के पत्र और शीशी का जल, शिवलिङ्ग में गिरा।
भाग्यवश शिवरात्रि के प्रथम पहर की पूजा हो गयी। निषाद के बहुत जन्मों के पापों का नाश हो गया। उधर हरिणी ने निषाद को देखा और बोली – तुम क्या कह रहे हो निषाद! उसने कहा- मेरे परिवार भूख से पीड़ित हैं अतः तुमको मारकर तेरे मांस से उनको तृप्त करूँगा। यह सुन कर हरिणी चिन्तित हुई और बोली- निषाद! मेरे मांस से तेरा मनोकर पूर्ण होता है तो मैं धन्य हूँ। दूसरों के प्राण बचाने के बराबर अन्य कोई श्रेष्ठ धर्म नहीं है। मेरे मांस से तुम्हारा परिवार निश्चय तृप्त होगा, पर मेरी एक प्रार्थना है, मेरे घर में छोटे-छोटे बच्चे हैं, उनको में अपनी बहिन को सौंप दूँगीं, तब मैं तेरे पास आऊँगी, तुमसे प्रतिज्ञा करके जाती हूँ। अवश्य ही आऊँगीं। सत्य के समान दूसरी कोई वस्तु नहीं है, यदि मैं न आऊँ तो विश्वासघात का पाप लगे। शिवजी का व्रत त्याग करने का पाप लगे। इस प्रकार शपथ खाकर हरिणी चुप हो गयी। निपाद को विश्वास हो गया, उसे जाने का वचन दे दिया। हरिणी जल पीकर अपने घर गई ।
संयोग से हरिणी की बहिन अपनी बहिन को ढूंढते-हूँ ढते वहाँ पर आ पहुँची, उसे देखकर निषाद ने फिर धनुष पर बाँण चढ़ाया उस वक्त निषाद के देह के स्पर्श से विल्वपत्र तथा जल शिवलिङ्ग के ऊपर गिर पड़े, इससे दूसरे प्रहर की शिवजी की पूजा पूर्ण हुई। इससे निषाद के बहुत से पाप नष्ट हो गये। हरिणी ने कहा हे निषाद तुम क्या कर रहे हो । निषाद ने पहले के समान उत्तर दिया। हरिणी डर गयी और उससे बोली हे निषाद! मेरे बड़े भाग्य हैं, क्योंकि यह शरीर नाश-वान है, यदि इससे दूसरे को सुख मिले तो इससे अधिक क्या है लेकिन अपनी छोटी बच्ची को पति के हाथ सौंपकर आऊँगी इस तरह बहुत सौगन्ध खाकर खड़ी हुई। तब निषाद ने जाने दिया। हरिणी प्रसन्न होकर पानी पीकर अपने घर गयो ।
निषाद ने जागरण में दो पहर रात बिता दिया, इधर हरिणी घर नहीं आई तब हरिण चिन्तित हुआ प्यास से व्याकुल होकर स्वयं ही चला, जब नदी के किनारे पहुँचा तो निषाद ने फिर अपने धनुष पर बांण चढ़ाया इस मुद्रा में निषाद को देखकर हरिण बोला निषाद यह क्या कर रहे हो! निषाद ने पहले के समान ही उत्तर दिया उसे सुनकर हरिण बोला, मेरे धन्य भाग्य हैं तुम्हारे परिवार को कृप्त करने वाला हूँ जो मनुष्य दूसरों को लाभ नहीं पहुँचाते, उनको संसार में जन्म लेना व्यर्थ है। किन्तु मेरे घर पर छोटा बच्चा है मैं उसे माँ को सौंप द्वै तब तुम्हारे पास आजाउँगा । परन्तु निषाद ने कहा तुम्हारे जैसे और भी बहुत आये थे उन्होंने मुझे धोखा दिया मैं तुम्हें नहीं छोडूंगा। हरिण बोला कि मैं कभी झूठ नहीं बोलता हूँ क्योंकि संसार में सत्य का पद बड़ा है। मैं सपथ करता हूँ, तुम्हारे पास अवश्य आ जाऊँगा । नहीं आऊँगा तो मुझे बड़े-बड़े हत्यायें करने का पाप लगे। यह सुनकर निषाद बोला अच्छा जाओ शीघ्र लौटना, हरिण पानी पीकर अपने घर गया।
यह हरिणियाँ अपने बच्चों के साथ एकत्रित होकर अपना-अपना वृतान्त कहकर दुःखी हुई। सत्य तथा धर्म से डरकर सबसे पहले प्रतिज्ञा करके जो हरिणी आइ थी वह अपने पति से बोली, मैंने पहले प्रतिज्ञा की थी इसलिये मैं निषाद के पास जाऊँगी तुम दोनों घर में रहकर वच्चों का पालन पोषण करना।
तव दूसरी हरिणी ने कहा, मैं व्याध के पास जाऊँगी, क्योंकि पहली स्त्री घर की स्वामीनी होती है। यह सुनकर हरिण बोला मैं ही स्वयं व्याध के पास जाऊँगा, अपने मांस से उस व्याध के परिवार को तृप्त करूंगा। किन्तु दोनों हरिणियों ने कहा कि हम घर में ‘राँड’ बनकर नहीं रहना चाहती हैं। धिक्कार है जो विधवा होकर घर में रहती हैं। सब परिवार लड़ते-झगड़ते निषाद के पास चले पीछे से उनके बच्चें ‘भी चले। क्योंकि रक्षक के बिना वे कैसे रह सकते थे। (जो माता-पिता की दशा होगी वही हमारी भी होगी) बधिक ने देखा सभी हरिणों का समूह एक साथ आ रहा है वह प्रसन्नता से पहले की तरह धनुष पर बाँण का अनुसन्धान करने लगा जिससे पहले की भाँति वेलपत्र तथा जल शिवजी के लिङ्ग के उपर गिर पड़े और चौथे प्रहर की पूजा भी पूर्ण हो गयी । इससे व्याध के सम्पूर्ण पाप नष्ट गये। तब दोनों हरिणियों और बच्चों के साथ हरिण बोला हे निषाद! अब मेरे शरीर को शुद्ध करके हमको मारो। किन्तु व्याध के पाप शिवजी के पूजन से जल चुके थे उसकी बुद्धि शुद्धि हो गयी उसे दया आयी। वह बोला…
हे मृगों के समुदाय! यद्यपि पशुओं की बुद्धि नहीं होती पर तुम सब धन्य हो, अपने शरीर के नष्ट होने पर भी दुसरे की भलाई करने को तैयार हो और मैंने मनुष्य होकर भी अपना जन्म जीवों का वध करने में बिताया। ऐसा घोर पाप करके परिवार का पालन किया करता हूँ। न जाने मैं किस अवस्था को प्राप्त होऊँगा। मैंने कोई धर्म नहीं किया । ऐसा कहते हुए व्याधने चिन्ता की आँसु बहाई और बोला । हे शुद्ध हरिण, हरिणियों! अब तुम लोग सब घर जाओ, तुम धन्य हो तुम्हारा घर भी धन्य है। तुम सभी अति उत्तम हो। व्याध ऐसा कह ही रहा था उसी समय शिवजी परम प्रसन्न होकर वहाँ प्रकट हुए और अपने करकमलों से व्याध का हाथ पकड़ कर कहे तुमसे मैं अति प्रसन्न हूँ। तुम्हे जो चाहिये वह वर माँगो।
तुमने शिवरात्रि व्रत किया है, तुम्हारे सब पाप नष्ट हो गये। तुम मेरा भक्त हुआ। भगवान् शिव की यह वात सुनकर व्याध जीवन मुक्त हुआ और शिवजी के चरणों में गिर पड़ा। उसके मुख से इतना ही शब्द निकला मैंने सब कुछ पाया। यह सुनकर शिवजी अति प्रसन्न हुए । उसका नाम ‘स्कन्द’ रखा, बहुत से वरदान दिये और कहा तुम अपने कुल के राजा होओगे शृङ्गवेरपुर को अपनी राजधानी बना- ओगे और राज्य करोगे। तुम्हारे बहुत सन्तान होगें उनकी देवता भो प्रशंसा करेगें। मेरे भक्त श्री रामचन्द्रजी तुमको सेवक जानकर तुम्हारे घर पधारेंगे, तुम्हें यश देगें। तुम मेरा भजन कभी मत भूलना। तुमको दुर्लभ मुक्ति मिलेगी। इतनी बातों को सुनकर हरिण के समूह भी मृग योनि का परित्याग करके देवताओं का रूप धारण कर, अशुपाश से मुक्त होकर दिव्य लोक में चले गये। शिवजी भी अन्तर्धान हो गये। और लिङ्ग के रूप में वही ‘व्यावेश्वर’ के नाम से प्रसिद्ध हुए। आज भी अर्बुद गिरि में वह लिङ्ग प्रसिद्ध है। उसके दर्शन तथा पूजन से भक्ति और मुक्ति मिलती है। निषाद ने श्रीराम का दर्शन तथा शिवजी का दर्शन करके बहुत काल तक सुख भोगा और अन्त में शिवजी का सायुज्य प्राप्त कर लिया। अनजान में शिवरात्री व्रत करने से अनायास ही मोक्ष मिला, बिना ज्ञान का मोक्ष मिलना असम्भव है। जो श्रद्धा भक्ति के साथ शिव-रात्री व्रत करेगा उनको तो कहना ही क्या है। जो नरनारी इसे पढ़ेगें सुनेगें, दोनों लोक में सुखी होगें।
ये भी पढ़ें:-
महाशिवरात्रि व्रत कथा Maha Shivratri Vrat Katha in Hindi
शिवजी की बड़ी आरती Bhagwan Shiv Ji Ki Badi Aarti Lyrics in Hindi
