होलिकोत्सव पर्व
(बुराई पर भलाई की जीत)

होलिका उत्सव पर्व का माहात्म्य
होली एक समाजिक रंगों का त्यौहार है, आनंदोल्लास का पर्व है। इसके समान आनंद और प्रसन्नता देने वाला दूसरा कोई त्यौहार नहीं है। इसे सभी नर-नारी बड़े उत्साह से मनाते हैं। श्रीब्रह्म पुराण में लिखा है कि फाल्गुन पूर्णिमा के दिन जो लोग चित्त को एकाग्र करके हिंडोले में झुलते हुए श्री गोविन्द पुरुषोत्तम के दर्शन करते हैं, वे निश्चय ही बैकुंठ लोक को जाते हैं।
इस त्यौहार का संबंध प्रह्लाद से जुड़ा हुआ बताया गया है। वैदिक काल में होली के पर्व को नवान्नेष्टि यज्ञ कहा जाता था। खेत से अधपके अन्न को यज्ञ में हवन करके प्रसाद लेने का विधान समाज में था। उस अन्न को होला कहते हैं। इसी से होलिकोत्सव नाम पड़ा।
होलिका उत्सव त्यौहार की पूजन विधि-विधान
यह त्यौहार फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी होलाष्टक से शुरु होकर पूर्णिमा तक चलता है। सायंकाल में होली जलाने के स्थान पर होलिका पूजन किया जाता है। पूजन के समय भद्रा नहीं होनी चाहिए। सूर्यास्त के बाद भद्रा मुहूर्त में होली का अग्नि संस्कार किया जाता है। गंध, पुष्प, धूप, नैवेद्य, दक्षिणा और फलों में नाममंत्र से होली का विधिवत पूजन किया जाता है।
जलती होली में गेहूं, चने और जौ की बालों को भूनने का भी विधान है। कुछ श्रद्धालु होली की अग्नि में घर में बनाई गई होली को जलाते हैं तो कुछ होली की भस्म भी घर ले जाते हैं।
होलिका उत्सव पर्व का पौराणिक संदर्भ
नारद पुराण के अनुसार आदिकाल में हिरण्यकश्यप नामक एक राक्षस हुआ था। दैत्यराज खुद को ईश्वर से भी बड़ा समझता था। वह चाहता था कि लोग केवल उसकी पूजा करें। लेकिन उसका खुद का पुत्र प्रह्लाद परम विष्णु भक्त था। भक्ति उसे उसकी मां से विरासत के रूप में मिली थी।
हिरण्यकश्यप के लिए यह बड़ी चिंता की बात थी कि उसका स्वयं का पुत्र विष्णु भक्त कैसे हो गया? और वह कैसे उसे भक्ति मार्ग से हटाए। हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र को विष्णु भक्ति छोड़ने के लिए कहा परंतु अथक प्रयासों के बाद भी वह सफल नहीं हो सका।
कई बार समझाने के बाद भी जब प्रह्लाद नहीं माना तो हिरण्यकश्यप ने अपने ही बेटे को जान से मारने का विचार किया। कई कोशिशों के बाद भी वह प्रह्लाद को जान से मारने में नाकाम रहा। बार-बार की कोशिशों से नाकाम होकर हिरण्यकश्यप आग बबूला हो उठा।
इसके बाद उसने अपनी बहन होलिका से मदद ली, जिसे भगवान शंकर से ऐसा वरदान मिला था जिसके अनुसार अग्नि उसे जला नहीं सकती थी। तय हुआ कि प्रह्लाद को होलिका के साथ बैठाकर अग्नि में स्वाहा कर दिया जाएगा।
होलिका अपने वरदान के साथ प्रह्लाद को गोद में लेकर चिता पर बैठ गयी। लेकिन विष्णु जी के चमत्कार से होलिका जल गई और प्रह्लाद की जान बच गयी। इसी के बाद से होली की संध्या को अग्नि जलाकर होलिका दहन का आयोजन किया जाता है।
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