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पूजा में कलश का महत्व और मांगलिकता का प्रतीक क्‍यों है ?

पौराणिक ग्रंथों में कलश को ब्रह्मा, विष्णु, महेश और मातृगण का निवास बताया गया है। समुद्र मंथन के उपरांत कलश में अमृत की प्राप्ति हुई थी। ऐसा माना जाता है कि जगत्जननी सीताजी का आविर्भाव भी कलश से ही हुआ था। प्राचीन मंदिरों में कमल पुष्प पर विराजमान लक्ष्मी का दो हाथियों द्वारा अपने-अपने सूंड़ […]

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ओ३म् (ॐ) का शास्त्रों में अधिक महत्त्व क्यों?

हिंदू संस्कृति में ॐ का उच्चारण अत्यंत महिमापूर्ण और पवित्र माना गया है। इसके उच्चारण में अ+उ+म् अक्षर आते हैं जिसमें ‘अ’ वर्ण ‘सृष्टि’ का द्योतक है, ‘उ’ वर्ण ‘स्थिति’ दर्शाता है जबकि ‘म’ ‘लय’ का सूचक है जो ब्रह्मा, विष्णु और महेश (शंकर) का बोध कराता है और इन तीनों शक्तियों का एक साथ […]

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स्वस्तिक कल्याण का प्रतीक क्यों ?

स्वस्तिक चिह (卐) में किसी धर्म विशेष की नहीं, बल्कि सभी धर्मों एवं समस्त प्राणि मात्र के कल्याण की भावना निहित है। इसीलिए हिन्दू धर्म में ही नहीं, अपितु विश्व के सारे धर्मों ने इसे परम पवित्र, मंगल करने वाला चिह्न माना है। प्रत्येक शुभ और कल्याणकारी कार्य में स्वस्तिक का चिह्न सर्वप्रथम प्रतिष्ठित करने […]

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रुद्राक्ष और तुलसी की माला धारण करना लाभदायक क्यों?

रुद्राक्ष, तुलसी आदि दिव्य औषधियों की माला धारण करने के पीछे वैज्ञानिक मान्यता यह है कि होंठ व जीभ का प्रयोग कर उपांशु जप करने से साधक की कंठ-धमनियों को सामान्य से अधिक कार्य करना पड़ता है, जिसके परिणामस्वरूप कंठमाला, गलगंड आदि रोगों के होने की आशंका होती है। उसके बचाव के लिए गले में […]

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माला में 108 दाने ही क्यों होते है ?

प्राचीन काल से ही जप करना भारतीय पूजा-उपासना पद्धति का एक अभिन्न अंग रहा है। जप के लिए माला की जरूरत होती है, जो रुद्राक्ष, तुलसी, वैजयंती, स्फटिक, मोतियों या नगों से बनी हो सकती है। इनमें रुद्राक्ष की माला को जप के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि इसमें कीटाणुनाशक शक्ति के अलावा विद्युतीय […]

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सत्यनारायण की कथा का महत्त्व क्यों ?

श्री सत्यनारायण व्रत कथा देश के अनेक भागों में बहुत लोकप्रिय है। सत्य ही नारायण है, यह भाव सत्यनारायण की कथा से उभरता है। सत्य को साक्षात् भगवान् मानकर जीवन में उसकी आराधना करना ही सत्य-व्रत है। लोग सत्यनारायण कथा के माध्यम से सत्य-व्रत का सही रूप समझें, तो वे सच्चे अर्थों में सुख-समृद्धि के […]

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जाति-पांति का भेद-भाव गलत और अनुचित क्यों ?

वर्ण व्यवस्था कर्म प्रधान होती है, जबकि जाति-पाति का संबंध जन्म वंश या कुल से होता है। वर्ण शब्द की उत्पत्ति ‘वृ’ धातु से हुई है, जिसका अर्थ वरण या चुनाव करना है। जो व्यक्ति अपने गुण, कर्म, स्वभाव के अनुसार व्यवसाय का चुनाव करता है, वह उसी वर्ण का कहलाता है। गीता में भगवान् […]

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पूजा कराने और दान-दक्षिणा लेने का अधिकारी ब्राह्मण ही क्यों?

ब्राह्मण में केवल सत्त्वगुण की प्रधानता होती है। इसीलिए उसमें सत्कर्मी को करने की स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। चूंकि उसका स्वभाव सत्कर्मों के अनुकूल होता है, इसलिए उन्हें करने में उसे किसी प्रकार की कठिनाई नहीं होती। भगवान् श्रीकृष्ण ने ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म इस प्रकार बताएं हैं- शमो दमस्तपः शौच क्षान्तिरार्जवमेव च। ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं […]

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ब्राह्मण को सर्वाधिक महत्त्व क्यों?

हमारे धार्मिक शास्त्रों ने ब्राह्मण को सर्वोच्च स्थिति प्रदान की है। इसका प्रमुख कारण यह है कि सात्त्विक गुणों की प्रधानता के कारण ब्राह्मण अपने सज्ञान से सारे समाज को उत्कृष्ट बनाने का प्रयत्न करता है। पढ़ना-पढ़ाना, यज्ञ करना और कराना तथा अच्छे संस्कार देना ब्राह्मण का धर्म है। सारे लोग सन्मार्ग पर चलें, उन्नति […]

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गायत्री मंत्र की सबसे अधिक मान्यता क्यों?

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यम् भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् । गायत्री मंत्र भारतीय संस्कृति का सनातन एवं अनादि मंत्र है। पुराणों में कहा गया है कि सृष्टिकर्ता ब्रह्मा को आकाशवाणी द्वारा गायत्री मंत्र प्राप्त हुआ था। सृष्टि निर्माण की शक्ति उन्हें इसी की साधना के तप से मिली थी। गायत्री की व्याख्या स्वरूप […]

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