जिन दिनों शेखचिल्ली दिल्ली में अपने दिन गुजार रहा था, उन दिनों महरौली इलाके में एक सेठ के घर पर चोरी हो गई। चोर बड़ी दिलेरी के साथ सेठ की तिजोरी खोलकर उसमें से जेवर और नकदी निकालकर ले गया। तिजोरी में चोर एक पर्चा लिखकर छोड़ गया- ‘अगली पूर्णमासी को फिर आकर इसी घर में चोरी करूँगा, रोक सकते हो तो रोक लो।’

सेठ ने पुलिस को खबर कर दी। पूर्णमासी की रात को पुलिस ने सेठ के घर की नाकेबन्दी कर दी। सेठ का घर पुलिस छावनी में बदल दिया। पुलिस को विश्वास था कि चोर तो क्या, सेठ के मकान में परिन्दा भी अब पर नहीं मार सकता। लेकिन दूसरे दिन पुलिस के इस विश्वास को जबर्दस्त झटका लगा क्योंकि रात को ही चोर ने सेठ की सन्दूक से कीमती सामान चुरा लिया था और सन्दूक में फिर एक पर्चा छोड़ छोड़ गए थे- ‘देख लिया पुलिस बुलाने का अंजाम ! अब अगली अमावस की रात को फिर आऊँगा, रोक सको तो रोको।’

सेठ ने सोचा कि पुलिस बुलाने का तो कोई फायदा नहीं हुआ, उल्टे पुलिसवालों की आवभगत में सैकड़ों रुपए खर्च हो गए मगर इस सिरफिरे जुनूनी चोर को रोकना भी तो जरूरी है। सेठ चोर को रोकने का उपाय सोच ही रहा था कि तभी उसके पास काम की तलाश में शेखचिल्ली पहुँच गया।

सेठ ने शेखचिल्ली से कहा- “काम तो मैं तुम्हें दे दूँगा। तुम चाहो तो तुम्हारी अच्छी कमाई हो जाएगी। अमावस की रात तक तुम्हें रुकना पड़ेगा। अमावस की रात को एक चोर इस मकान में चोरी करने आएगा। अगर तुमने चोरी होने से इस घर को बचा लिया तो मैं तुम्हें एक हजार रुपए दूँगा और अगर तुमने चोर को पकड़ लिया तो इनाम में तुम्हें पाँच जार रुपए मिलेंगे।”

शेखचिल्ली को भला क्या एतराज होता! पलों में जीनेवाले शेखचिल्ली के लिए अमावस तक सिर छिपाने का इन्तजाम हो गया। वह यह सोचकर प्रसन्न हो गया कि अमावस तक उसे खाने के लिए नहीं सोचना पड़ेगा… आगे की फिर आगे सोची जाएगी।

एक के बाद एक दिन गुजरते गए और आखिर अमावस आ ही गया। शेखचिल्ली ने दिन में ही छत का मुआयना कर लिया था। छत पर एक ऐसी जगह थी जो सेठ के मकान को दो भागों में बाँटती थी। इस जगह के ठीक नीचे से एक तीन फीट की गली जाती थी। यह गली सुनसान थी जो आगे मुख्य मार्ग से जुड़ जाती थी। शेखचिल्ली ने एक पटरा उठाया और दोनों छतों की मुँड़ेरों पर उसे रख दिया और तय कर लिया कि चोर को पकड़ने के लिए वह इस पटरे पर बैठकर नीचे वाली गली पर ध्यान लगाए रहेगा। चोर जरूर इसी गली से घर में घुसेगा क्योंकि मुख्य मार्ग से वह आने का साहस नहीं करेगा। अपनी तैयारियाँ करने के बाद शेखचिल्ली घर में आ गया।

सेठ ने उसे याद दिलाया- “आज अमावस है।”

“हाँ, सेठ जी! मगर अमावस की चिन्ता मुझे नहीं, चोर को होनी चाहिए क्योंकि मेरा नाम शेखचिल्ली है।”

सेठ शेखचिल्ली की बातों से आश्वस्त हुआ और बोला- “भाई शेख ! तुम अकेले नहीं हो। आज रात मेरा पूरा परिवार तुम्हारे सहयोग के लिए तैयार रहेगा।”

शेखचिल्ली ने अपनी तरफ से सेठ को तसल्ली दी-“अगर चोर आया तो मेरे बिछाए जाल में फँसकर ही रहेगा।”

वह खाना खाकर छत पर आ गया। जब रात गहराने लगी तब वह मुँडेर पर रखी तख्ती पर चढ़कर गली पर नजर रखने लगा। अमावस की रात गहरा गई। गली में घुप्प अँधेरा हो गया। तभी छत पर कोई आया और पटरे से टकरा गया। पटरे पर शेखचिल्ली बैठा था। वह छिटककर नीचे गिरा किन्तु जमीन पर न गिरकर किसी के शरीर पर। धपाक् की आवाज रात के सन्नाटे में गूँज गई और इसके साथ ही किसी के जोर से कराहने की आवाज भी उभरकर आई-बाप रे! मेरी टाँगें गईं।”

सेठ के घर में लोग जगे हुए थे, वे हाथ में लालटेन लिये दौड़ते हुए बाहर आए। गली में पहुँचकर देखा कि एक आदमी पर शेखचिल्ली सवार था। सेठ और उसके लड़के ने मिलकर उस आदमी को अपनी पकड़ में ले लिया था। वह आदमी दर्द से अब भी बिलबिला रहा था। उसके एक पाँव की हड्डी टूट गई थी। शेखचिल्ली उसके ऊपर ही पटरे सहित गिरा था।

उस आदमी पर गिरने के कारण शेखचिल्ली चोट खाने से साफ बच गया था। उस आदमी को दबोचे-दबोचे सेठ का लड़का बोल रहा था कि छत पर अभी मैं गया था तब इस आदमी के किसी साथी से टकरा गया था।

इसकी बात सुनकर मन ही मन शेखचिल्ली ने खुदा का शुक्रिया अदा किया कि पटरे से उसके गिरने की बात कोई नहीं जानता है। उसने उस चोर के बालों को मुट्ठी में पकड़ते हुए सेठ से पूछा- “क्यों जनाब! मैंने अपना वादा तो पूरा कर दिया न?”

“हाँ, भाई! तुमने तो कमाल कर दिया।” सेठ ने कहा।

शेखचिल्ली ने पूछा- “आप भी अपना वादा पूरा करोगे न?”

“हाँ, भाई! क्यों नहीं! तुमने इस शातिर चोर को पकड़कर हमारे ऊपर बहुत बड़ा एहसान किया है।”

सेठ ने दूसरे दिन सुबह थाने को सूचना देकर उस चोर को पुलिस के हवाले कर दिया और शेखचिल्ली को नकद पाँच हजार रुपए देकर विदा किया।

सेठ के घर से शेखचिल्ली विदा हो चुका था। उसकी जेब में पाँच हजार रुपए थे मगर उसकी जिन्दगी का वह मौलिक प्रश्न अब भी उसका पीछा कर रहा था-‘जाएँ तो जाएँ कहाँ?’ इसी सवाल को अपने दिमाग में बसाए शेखचिल्ली दिल्ली में महरौली की सड़कों पर इधर-उधर भटक रहा था कि एक चैराहे पर उसे भीड़ दिखी और दिखा कुतुबमीनार ! शेखचिल्ली ने मदरसे में किताबों मं कुतुबमीनार के बारे में पढ़ा था। वह अन्य सैलानियों की तरह कुतुबमीनार देखने के लिए चला गया। मगर गेट पर उसे उसी तरह दरबानों ने रोक दिया- “टिकट दिखाओ।”

शेखचिल्ली चिढ़ गया- “अरे भाई, कुतुबमीनार देखने ही जा रहे हैं, वहाँ से कुछ लेने तो नहीं जा रहे हैं! फिर काहे का टिकट?”

“भाई साहब! अगर कुतुबमीनार बाहर से देखेंगे तो पैसे नहीं लगेंगे। भीतर से देखोगे तो इसके लिए तुम्हें टिकट कटाना पड़ेगा।”

दरबान के इस दो-टूक उत्तर ने बहस की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी। शेखचिल्ली की समस्या थी कि उसने सेठ से मिले पाँच हजार रुपए एक कपड़े में बाँधकर वह कपड़ा अपनी कमर पर बेल्ट की तरह बाँध लिया था ताकि वह जेब कतरों और झपटमारों की नजर से अपने पैसों को बचाए रख सके। वह यह भूल गया था कि मनमोहन से मिली रकम का एक बड़ा हिस्सा उसके पास है जो अभी तक खर्च नहीं हुआ है।

वह कुतुबमीनार के प्रवेश द्वार से हटकर एक तरफ खड़ा हो गया और अनजाने ही अपने कुर्ते की जेब में हाथ डाला तो उसके हाथ में कागज के कुछ टुकड़े आ गए। शेखचिल्ली ने कागज के उन टुकड़ों को जेब से निकाला तो देखा, कागज के वे टुकड़े सौ-सौ और दस-दस रुपए के नोट हैं। उनमें कुछ पाँच रुपए और एक रुपए के नोट भी थे। अब उसे याद आ गया कि ये रुपए मनमोहन से मिले रुपयों मं से बचे हुए रुपए हैं। उसने अपने दिमाग में ही हिसाब लगाया-सौ रुपए कमाई के, ग्यारह सौ मनमोहन के यानी कुल बारह सौ रुपए। इसमें से सात सौ रुपए अम्मी को मनीऑर्डर किया, बचे पाँच सौ रुपए। इन पाँच सौ रुपयों में दो दिन रैन बसेरा और भोजन पर तीस-चालीस रुपए खर्च हुए तो भी अभी जेब में साढ़े चार सौ से अधिक रुपए हैं। उसने रूपयों को वापस जेब में रखा तो पाया, जेब में कुछ रेजगारियाँ भी बची हुई थीं।

पैसों की निश्चिन्तता महसूस होते ही शेखचिल्ली कतार में लग गया। कुतुबमीनार देखने के लिए दो आने का टिकट कटा लिया और कुतुबमीनार देखने के लिए सैलानियों की तरह परिसर में चला गया। उसे ऊँची खड़ी मीनार देखने में मशगूल लोगों की भीड़ तो दिखी मगर यह समझ में नहीं आया कि लोग देख क्या रहे हैं! वह भीड़ से कटकर एक तरफ जाकर बैठ गया और सोचने लगा-दिल्ली अजीब शहर है… यहाँ चुनौतियाँ देकर चोर चोरी करते हैं। विश्वास करने वाले मालिक को नौकर चूना लगाता है और कर्तव्य-परायण नौकर पर मालिक हेकड़ी दिखाता है… यह रहने और बसने लायक जगह नहीं है… कम-से-कम मेरे लिए तो नहीं।

लगभग इसी समय दो आदमी उसके पास खड़े होकर बातें करने लगे- “भैया! यह बात समझ में नहीं आती कि यह कुतुबमीनार बना कैसे?”

“अरे भाई! मुझे तो लगता है कि एक बाँस पर दूसरे बाँस, दूसरे पर तीसरे, तीसरे पर चैथे बाँस को जोड़कर पहले खड़ा किया गया फिर इनकी जोड़ाई और ढलाई की गई।” दूसरे ने कहा।

“मगर भाई! चाहे जैसे बनी हो, यह मीनार है बहुत अद्भुत और नहीं लगता कि जैसे तुम बता रहे हो, वैसे ही यह बनाई गई होगी!”

शेखचिल्ली उन दोनों की बातें सुन रहा था। उसने उन दोनों को टोका-“अरे यार, तुम लोग भी क्या बात कर रहे हो! यह भी कोई सोचने की बात है! बेवजह ही मगजमारी कर रहे हो। अरे भाई, पहले इस धरती में एक गहरा कुआँ खोदा गया। उतना गहरा, जितनी ऊँची यह मीनार है। फिर उस कुएँ में ईंट चुनवा दिए गए और ढलाई कर दी गई। कुछ दिनों में जब ढलाई जमकर पक्की हो गई तो उसे कुएँ से निकालकर मीनार खड़ी कर दी गई और कुआँ भर दिया गया।”

वे दोनों अवाक् कभी मीनार को देखते और कभी शेखचिल्ली को।

उन दोनों को अवाक् छोड़ते हुए शेखचिल्ली अपनी जगह से उठा और धीरे-धीरे टहलता हुआ गेट से बाहर निकल गया। उसने घर वापसी का इरादा कर लिया था और अब उसके कदम तेजी से रेलवे स्टेशन की ओर बढ़ रहे थे।

Also Read This:

चोरी न करने का संकल्प! Sheikh Chilli Ki Kahaniyan in Hindi

चैराहे से ससुराल तक! Sheikh Chilli Ki Kahaniyan in Hindi

Leave a comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *