Chaturmas Vrat Katha Aur Niyam in Hindi
Chaturmas Vrat Katha Aur Niyam in Hindi

चातुर्मास्य विधान (Chaturmasya Vrata) आषाढ़ शुक्ल एकादशी (देवशयनी) से कार्तिक शुक्ल एकादशी (प्रबोधिनी) तक के चार पवित्र महीनों का व्रत है, जिसमें भगवान विष्णु योग निद्रा में रहते हैं। यह अवधि आत्म-संयम, सात्विक भोजन, पूजा-पाठ और तपस्या के लिए समर्पित है, जिसमें शादी, गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्य वर्जित होते हैं।

चातुर्मास्य के प्रमुख नियम और विधान (Chaturmas Vrat Niyam):

समय: यह 4 महीने की अवधि है (मुख्यतः सावन, भाद्रपद, अश्विन, कार्तिक)।
खान-पान (सात्विक): सात्विक जीवन व्यतीत करें। मांस, मछली, प्याज, लहसुन, शराब का सेवन न करें।

नियम (प्रत्येक माह का विशिष्ट त्याग):
पहला महीना (श्रावण): पालक, धनिया, मेथी जैसी पत्तेदार सब्जियां न खाएं।
दूसरा महीना (भाद्रपद): दही का सेवन वर्जित।
तीसरा महीना (अश्विन): दूध का सेवन न करें।
चौथा महीना (कार्तिक): उड़द की दाल और द्विदला (दो दाल वाली) वस्तुओं का त्याग करें।

जीवनशैली: जमीन पर सोएं, ब्रह्मचर्य का पालन करें, और निंदा/क्रोध से बचें।
पूजा-पाठ: प्रतिदिन स्नान, तुलसी पूजा, और भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करें। दीपदान करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
दान: इस अवधि में दान करने का फल अनंत गुना माना जाता है।

कुन्ती पुत्र अर्जुन बोले- “हे मधुसूदन! विष्णु भगवान् का शयन व्रत किस प्रकार किया जाता है। सो सब कृपापूर्वक कहिए।”

श्री कृष्ण बोले- “हे अर्जुन ! अब मैं तुम्हें विष्णु के शयन का व्रत विस्तार से कहता हूं। इसे ध्यानपूर्वक स्मरण करो-

जब सूर्य नारायण कर्क राशि में स्थित हों, तब भगवान् विष्णु शयन करते हैं और जब सूर्य नारायण तुला राशि में आते हैं तब भगवान् उठते है। लौंद (अधिक) माह के आने पर भी विधि इसी प्रकार रहती है। इस विधि से अन्य देवताओं को शयन न कराना चाहिए। आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का विधिपूर्वक व्रत करना चाहिए। उस दिन विष्णु भगवान् की प्रतिमा बनानी चाहिए और चातुर्मास्य व्रत नियम से करना चाहिए। सबसे प्रथम उस प्रतिमा को स्नान कराना चाहिए। फिर सफेद वस्त्रों को धारण कराकर तकियादार शैय्या पर शयन कराना चाहिए। उनका धूप, दीप और नैवेद्यादि से पूजन कराना चाहिए। भगवान् का पूजन शास्त्र ज्ञाता ब्राह्मणों के द्वारा कराना चाहिए, तत्पश्चात् भगवान् विष्णु की इस प्रकार स्तुति करनी चाहिए-

“हे भगवान्! मैंने आपको शयन कराया है। आपके शयन से सम्पूर्ण विश्व सो जाता है।” इस तरह विष्णु भगवान् के सामने हाथ जोड़कर प्रार्थना करनी चाहिए “हे भगवान्! आप जब चार मास तक शयन करें, तब तक मेरे इस चातुर्मास्य व्रत को निर्विघ्न रखें।”

इस प्रकार विष्णु भगवान् की स्तुति करके शुद्ध भाव से मनुष्यों को दातुन आदि के नियम को ग्रहण करना चाहिए। विष्णु भगवान् के व्रत को शुरू करने के पांच काल वर्णन किये हैं। देवशयनी एकादशी से लेकर देवोत्थानी एकादशी तक चातुर्मास्य व्रत को करना चाहिए। द्वादशी, पूर्णमाशी, अष्टमी या संक्रान्ति को व्रत प्रारम्भ करना चाहिए और कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी को समाप्त कर देना चाहिए। इसके व्रत से समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। जो मनुष्य इस व्रत को प्रति वर्ष करते हैं, वह सूर्य के समान देदीप्यमान विमान पर बैठकर विष्णु लोक को जाते हैं।

हे राजन्! अब आप इसमें दान का पृथक् पृथक् फल सुनें-

जो मनुष्य देव मन्दिरों में रंगीन बेल-बूटे बनाता है, उसे सात जन्म तक ब्राह्मण की योनि मिलती है।

जो मनुष्य चातुर्मास्य के दिनों में विष्णु भगवान् को दही, दूध, घी, शहद और मिश्री आदि पंचामृत के द्वारा स्नान कराता है, वह वैभवशाली होकर सुख भोगता है।

जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक भूमि, स्वर्ण, दक्षिणा आदि ब्राह्मणों को दान स्वरूप देता है, वह स्वर्ग में जाकर इन्द्र के समान सुख भोगता है।

जो विष्णु भगवान् की स्वर्ण प्रतिमा बनाकर धूप, दीप, पुष्प, नैवेद्य आदि से पूजा करता है, वह इन्द्र लोक में जाकर अक्षय सुख भोगता है।

जो मनुष्य चातुर्मास्य के अन्दर नित्य भगवान् को तुलसीजी अर्पित करता है, वह स्वर्ण के विमान पर बैठकर विष्णु लोक को जाता है।

जो मनुष्य विष्णु भगवान् की धूप-दीप से पूजा करता है, उनको अनन्त धन मिलता है।

जो मनुष्य इस एकादशी से कार्तिक के महीने तक विष्णु की पूजा करते हैं, उनको विष्णु लोक की प्राप्ति होती है।

इस चातुर्मास्य व्रत में जो मनुष्य संध्या के समय देवताओं तथा ब्राह्मणों को दीपदान करते हैं तथा ब्राह्मणों को सोने के पात्र में वस्त्र दान देते हैं, वह विष्णु लोक को जाते हैं।

जो मनुष्य भक्तिपूर्वक भगवान् का चरणामृत लेते हैं, वे इस संसार के आवागमन के चक्र से छूट जाते हैं।

जो विष्णु मन्दिर में नित्य प्रति १०८ बार गायत्री मंत्र का जप करते हैं, वे पापों में लिप्त नहीं होते।

जो मनुष्य पुराण तथा धर्मशास्त्र को सुनते हैं और वेदपाठी ब्राह्मण को वस्त्रों का दान करते हैं वे दानी, धनी, ज्ञानी और यशस्वी होते हैं।

जो मनुष्य भगवान् या शिवजी का स्मरण करते हैं और अन्त में उनकी प्रतिमा दान करते हैं, वह पापों से रहित होकर गुणवान बनते हैं।

जो मनुष्य सूर्य नारायण को अर्घ्य देते हैं और समाप्ति में गौदान करते हैं, वे नीरोगिता, दीर्घायु, कीर्ति, धन और बल पाते हैं।

चातुर्मास्य में जो मनुष्य गायत्री मंत्र द्वारा तिल से होम करते हैं और चातुर्मास्य समाप्त हो जाने पर तिल का दान करते हैं; उनके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और नीरोग शरीर मिलता है तथा अच्छी संस्कारशील सन्तान उत्पन्न होती है।

जो मनुष्य चातुर्मास्य व्रत अन्न से होम करते हैं और समाप्त हो जाने पर घी, घड़ा और वस्त्रों का दान करते हैं, वे ऐश्वर्यशाली होते हैं।

जो मनुष्य तुलसीजी को धारण करते हैं तथा अन्त में विष्णु भगवान् के निमित्त ब्राह्मणों को दान देते हैं, वह विष्णु लोक को जाते हैं।

जो मनुष्य चातुर्मास्य व्रत में भगवान् के शयन के उपरान्त उनके मस्तक पर नित्य-प्रति दूध चढ़ाते हैं और अन्त में स्वर्ण की दूर्वा दान करते हैं तथा दान देते समय जो इस प्रकार की स्तुति करते हैं कि- ‘हे दूर्वे! जिस भांति इस पृथ्वी पर शाखाओं सहित फैली हुई हो, उसी प्रकार मुझे भी अजर-अमर सन्तान दो’, ऐसा करने वाले मनुष्य के सब पाप छूट जाते हैं और अन्त में स्वर्ग को जाते हैं।

जो शिवजी या विष्णु भगवान् का गान करते हैं, उन्हें रात्रि जागरण का फल मिलता है।

जो मनुष्य चातुर्मास्य व्रत करते हैं, उनको उत्तम ध्वनि वाला घण्टा दान करना चाहिए और इस प्रकार स्तुति करनी चाहिए ‘हे भगवान्! हे जगदीश्वर! आप पापों का नाश करने वाले हैं। मेरे न करने योग्य कार्यों को करने से जो पाप उत्पन्न हुए हैं, आप उनको नष्ट कीजिये।’

चातुर्मास्य व्रत के अन्दर जो नित्य-प्रति ब्राह्मणों का चरणामृत पान करते हैं; वे समस्त पापों तथा दुःखों से छूट जाते हैं और आयुवान, लक्ष्मीवान होते हैं।

चातुर्मास में प्राजापत्य तथा चान्द्रायण व्रत पद्धति का पालन भी किया जाता है।

प्राजापत्य व्रत को 12 दिनों में पूर्ण करते हैं। व्रत आरम्भ में पहले तीन दिन बारह ग्रास भोजन प्रतिदिन लेते हैं, फिर आगामी तीन दिनों तक प्रतिदिन छब्बीस ग्रास भोजन लेते हैं, इसके आगे के तीन दिनों तक अट्ठाईस ग्रास भोजन लिया जाता है और इसके बाद बाकी बचे तीन दिन निराहार रहने की परम्परा है। इस व्रत के करने से मनोकामना पूर्ण होती है। व्रत करने वाला साधक प्राजापत्य व्रत करते हुए चातुर्मास्य के हेतु उपयुक्त सभी धार्मिक कृत्य जैसे पूजन, जप, तप, दान, शास्त्रों का पठन-पाठन तथा कीर्तनादि करता रहे।

हे अर्जुन! इसी प्रकार चान्द्रायण व्रत भी किया जाता है। अब इस व्रत की विधि सुनो – यह व्रत पूरे माह किया जाता है। पापों की निवृत्ति के लिए किया जाने वाला यह व्रत बढ़ता-घटता रहता है। इसमें अमावस्या को एक ग्रास, प्रतिपदा को दो ग्रास, द्वितीया को तीन ग्रास भोजन लेते हुए पूर्णिमा के पूर्व चौदह ग्रास और पूर्णिमा को पन्द्रह ग्रास भोजन लेना चाहिए। फिर पूर्णिमा के बाद १४, १३, १२, ११, ग्रास इस क्रम में भोजन लेते हुए भोजन की मात्रा प्रतिदिन घटानी चाहिए।

“हे अर्जुन!” भगवान् श्री कृष्ण ने कहा “जो प्राजापत्य और चान्द्रायण व्रत करते हैं उन्हें इस लोक में धन सम्पत्ति, शारीरिक नीरोगता तथा ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है। इसमें कांसे का पात्र और वस्त्र दान की शास्त्रीय व्यवस्था है। चातुर्मास्य के समापन पर दक्षिणा से सुपात्र ब्राह्मणों को सन्तुष्ट करने का विधान है।

चातुर्मास्य व्रत के समाप्त हो जाने के बाद ही गौ-दान करना चाहिए। यदि गौ-दान न कर सकें तो वस्त्र दान अवश्य करना चाहिए।

जो ब्राह्मणों को नित्य-प्रति नमस्कार करते हैं, उनका जीवन सफल हो जाता है और वे समस्त पापों से छूट जाते हैं।

चातुर्मास्य व्रत की समाप्ति में जो ब्राह्मणों को भोजन कराता है उसकी आयु तथा धन में वृद्धि होती है।

जो अलंकार सहित बछड़े वाली कपिला गाय वेदपाठी ब्राह्मणों को दान करते हैं, वे चक्रवर्ती आयुवान्, पुत्रवान् राजा होते हैं और स्वर्ग लोक में प्रलय के अन्त तक इन्द्र के समान राज्य करते हैं।

जो मनुष्य सूर्य भगवान् तथा गणेशजी को नित्य नमस्कार करते हैं, उनकी आयु तथा लक्ष्मी बढ़ती है और यदि गणेशजी प्रसन्न हो जायें तो वे मनोवांछित फल पाते हैं।

गणेशजी और सूर्य की प्रतिमा ब्राह्मण को देने से सब कार्यों की सिद्धि होती है।

जो मनुष्य दोनों ऋतुओं में महादेवजी की प्रसन्नता के लिए तिल और वस्त्रों के साथ तांबे का पात्र दान करते हैं, उनके यहां स्वस्थ सुन्दर शिवभक्त सन्तान होती है। चातुर्मास्य व्रत की समाप्ति पर चांदी या तांबा-पात्र गुड़ और तिल के साथ दान करना चाहिए।

जो मनुष्य विष्णु भगवान् के शयन करने के उपरान्त यथाशक्ति वस्त्र और तिल के साथ स्वर्णदान करते हैं, उनके समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं और वे इस लोक में भोग तथा परलोक में मोक्ष प्राप्त करते हैं।

चातुर्मास्य व्रत के समाप्त होने पर जो शय्यादान करते हैं, उनको अक्षय सुख मिलता है और वे कुबेर के समान धनवान होते हैं।

वर्षा ऋतु में जो गोपीचंदन देते हैं, उन पर भगवान् प्रसन्न होते हैं। चातुर्मास्य में एक बार भोजन करने वाला, भूखे को अन्न देने वाला, भूमि पर शयन करने वाला अभीष्ट को प्राप्त करता है। इन्द्रिय निग्रहकर चातुर्मास्य व्रत का अनन्त फल प्राप्त किया जाता है। श्रावण में शाक, भादों में दही आश्विन में दूध और कार्तिक में दाल का त्याग करने वाले नीरोगी होते हैं।

चातुर्मास्य व्रत का पालन करने पर उद्यापन किया जाए। जब भगवान् को शय्या त्यागने का अनुरोध करें तब विशेष पूजन करना चाहिए। इस अवसर पर निरभिमानी, विद्वान् ब्राह्मण को अपनी क्षमता के अनुसार दान-दक्षिणा देकर सन्तुष्ट करना चाहिए। हे पाण्डुनन्दन ! देवशयनी एकादशी और चातुर्मास का माहात्म्य पुण्य फलदायी है, इससे मानसिक रोगों की शान्ति और भगवान् विष्णु के प्रति निष्ठा बढ़ती है।

कथासार

चार्तुमास्य भगवान् विष्णु की कृपा प्राप्त करने के लिए लगभग चार माह तक किया जाने वाला व्रत है। इस व्रत को देवशयनी से देवोत्थान एकादशियों से जोड़ने से प्रभु के प्रति अपना अनुराग दृढ़ होता है। चतुर्मास चौमासे में जब भगवान् श्री हरि विष्णु शयन करते हैं, उस समय कोई भी मांगलिक कार्य नहीं किए जाते, मांगलिक कार्यों का आरम्भ देवोत्थानी एकादशी से पुनः प्रारम्भ करते हैं।

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