आचार्य वसिष्ठ ने पुत्रवान् व्यक्ति की महिमा के संबंध में कहा है- अपुत्रिण इत्यभिशापः । -वासिष्ठ स्मृति 17/8 अर्थात् पुत्रहीनता एक प्रकार का अभिशाप है। और आगे भी बताया है- पुत्रेण लोकांजयति पौत्रेणानन्त्यमश्नुते । अथ पुत्रस्य पौत्रेण ब्रघ्नस्याप्नोति विष्टपम् ॥ – वासिष्ठ स्मृति 17/5 अर्थात् पिता, पुत्र होने से लोकों को जीत लेता है, पौत्र […]
पूर्वजों का श्राद्ध कर्म करना आवश्यक क्यों?
ब्रह्मपुराण के मतानुसार अपने मृत पितृगण के उद्देश्य से पितरों के लिए श्रद्धा पूर्वक किए जाने वाले कर्म विशेष को श्राद्ध कहते हैं। श्राद्ध से ही श्रद्धा कायम रहती है। कृतज्ञता की भावना प्रकट करने के लिए किया हुआ श्राद्ध समस्त प्राणियों में शांतिमयी सद्भावना की लहरें पहुंचाता है। ये लहरें, तरंगें न केवल जीवित […]
पिंडदान करने की परंपरा क्यों है? Pind Daan Kyon Kiya Jata Hai?
हिंदू धर्म में पिंडदान की परंपरा वेदकाल से ही प्रचलित है। मरणोपरांत पिंडदान किया जाता है। दस दिन तक दिए गए पिंडों से शरीर बनता है। क्षुधा का जन्म होते ही ग्यारहवें व बारहवें दिन सूक्ष्म जीव श्राद्ध का भोजन करता है। ऐसा माना जाता है कि तेरहवें दिन यमदूतों के इशारे पर नाचता हुआ […]
मृतक का तर्पण क्यों किया जाता है? Mritak Ka Tarpan Kyon Kiya Jata Hai?
मनुस्मृति में तर्पण को पितृ-यज्ञ बताया गया है और सुख-संतोष की वृद्धि हेतु तथा स्वर्गस्थ आत्माओं की तृप्ति के लिए तर्पण किया जाता है। तर्पण का अर्थ पितरों का आवाहन, सम्मान और क्षुधा मिटाने से ही है। इसे ग्रहण करने के लिए पितर अपनी संतानों के द्वार पर पितृपक्ष में आस लगाए खड़े रहते हैं। […]
फूल (अस्थियों) का गंगा आदि पवित्र नदियों में विसर्जन क्यों करते हैं?
मृतक की अस्थियों (हड्डियों) को धार्मिक दृष्टिकोण से ‘फूल’ कहते हैं। इसमें अगाध श्रद्धा और आदर प्रकट करने का भाव निहित होता है। जहां संतान फल है, वहीं पूर्वजों की अस्थियां ‘फूल’ कहलाती हैं। इन्हें गंगा जैसी पवित्र नदी में विसर्जन करने के दो कारण बताए गए हैं। पहला कूर्मपुराण के मतानुसार- यावदस्थीनि गंगायां तिष्ठन्ति […]
जानें अंत्येष्टि संस्कार क्यों किया जाता है?
मनुष्य के प्राण निकल जाने पर मृत शरीर को अग्नि में समर्पित कर अंत्येष्टि संस्कार करने का विधान हमारे ऋषियों ने इसलिए बनाया, ताकि सभी स्वजन, संबंधी, मित्र, परिचित अपनी अंतिम विदाई देने आएं और इससे उन्हें जीवन का उद्देश्य समझने का मौका मिले, साथ ही यह भी अनुभव हो कि भविष्य में उन्हें भी […]
पत्नी को वाम अंग बैठाने की प्रथा क्यों?
महाभारत शांति पर्व 235.18 के अनुसार पत्नी पति का शरीर ही है और उसके आधे भाग को अद्धांगिनी के रूप में वह पूरा करती है। तैत्तिरीय ब्राह्मण 33.3.5 में इस प्रकार लिखा है- ‘अथो अर्धी वा एवं अन्यतः यत् पत्नी’ अर्थात् पुरुष का शरीर तब तक पूरा नहीं होता, जब तक कि उसके आधे अंग […]
शास्त्रों में सगोत्र (एक ही गोत्र में) विवाह करना वर्जित क्यों?
एक ही गोत्र में शादी क्यों नहीं करनी चाहिए! हमारी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार विवाह अपने कुल में नहीं, बल्कि कुल के बाहर होना चाहिए। एक गोत्र में (सगोत्री) विवाह न हो सके, इसीलिए विवाह से पहले गोत्र पूछने की प्रथा आज भी प्रचलित है। शास्त्रों में अपने कुल में विवाह करना अधर्म, निंदित और […]
मांग में सिंदूर भरना सुहाग की निशानी क्यों ?
विवाह के अवसर पर एक संस्कार के रूप में वर, वधू की मांग में सिंदूर भरता है। इसे ही सुमंगली क्रिया कहते हैं। इसके पश्चात् विवाहित स्त्री अपने पति की दीर्घायु की कामना करते हुए जीवन-भर मांग में सिंदूर लगाए रखती है, क्योंकि मांग में सिंदूर भरना हिंदू धर्म की परंपरा के अनुसार सुहागिन होने […]
विवाह में सात फेरे अग्नि के समक्ष ही क्यों?
यज्ञाग्नि के चारों ओर फिरना ही परिक्रमाएं फेरे के नाम से जानी जाती हैं। इसे भांवर फिरना भी कहते हैं। यों तो शास्त्रों के अनुसार यज्ञाग्नि की चार परिक्रमाएं करने का विधान है, लेकिन लोकाचार से सात परिक्रमाएं करने की प्रथा चल पड़ी है। ये सात फेरे विवाह संस्कार के धार्मिक आधार होते हैं। इन्हें […]
