“तुमने इस आदमी को नौकरी से क्यों नहीं निकाला?” काजी की परेशान बीबी ने रात को उनसे पूछा।

“मैं अपना कान कुतरवाऊं और इस हरामखोर को एक साल की तनख्वाह भी दूं और साथ में पूरे शहर का मज़ाक भी बनूं! मैं ऐसा कभी नहीं करूंगा।”

“तब तुम एक काम करो। एक और नौकर ढूंढ़ो,” बीबी ने गुस्से में कहा। “और इस बेशकीमती शेख चिल्ली को तुम सिर्फ अपने काम के लिए ही रखो।”

“बहुत अच्छा,” काज़ी ने कहा। “तुम शेख चिल्ली को अब से कम-से-कम खाना देना। बस इतना खाना देना कि वो मरे नहीं। मैं उसे रोज़ाना अपने साथ कचहरी ले जाया करूंगा। देखते हैं कि वो बिना काम और भोजन के कितने दिन जिंदा रह पाता है।”

परंतु काज़ी को जल्दी ही अपनी गलती का अहसास हो गया। शेख कचहरी के बाहर बैठे-बैठे, दिन में सपने देखता या फिर और लोगों से गप्पे लगाने में काफी खुश था। जब लोगों को यह पता चला कि उसे इतना कम खाना मिलता है तो लोगों ने खुद उसे अपना भोजन देना शुरू कर दिया!

एक दिन काज़ी की पत्नी ने नए नौकर के हाथ कचहरी में काज़ी के लिए एक संदेश भेजा। उन्हें आटा खरीदने के लिए तुरंत कुछ पैसों की जरूरत थी। दरबान ने नौकर को कचहरी के अंदर घुसने नहीं दिया।

“मैं तुम्हारी मदद करूंगा,” शेख ने कहा। वो कचहरी के दरवाजे पर खड़ा होकर चिल्लाया, “सरकार, घर में न तो पैसे हैं और न ही आटा! आप जल्दी कुछ करें!”

काज़ी को यह सुनकर बहुत शर्म आई। “बेवकूफ!” उन्होंने बाद में शेख को डांटा। “खबरदार! जो आज से तुमने दुबारा कचहरी में इस तरह का अड़ंगा डाला!”

कुछ दिनों बाद काज़ी के घर में आग लग गई। बेगम का नया नौकर दौड़ता हुआ कचहरी में काज़ी को इसकी सूचना देने के लिए आया। “तुम घर जाकर मदद करो,” शेख ने उससे कहा। “मैं काज़ी साहब को इसके बारे में बता दूंगा।” क्योंकि शेख को कचहरी के समय काज़ी साहब के काम में अड़ंगा डालने के लिए सख्ती से मना किया गया था इसलिए वो शाम तक धैर्य से इंतज़ार करता रहा। तब तक काज़ी का आधे से ज़्यादा घर जलकर राख हो चुका था !

काज़ी की पत्नी एक रईस व्यवसायिक परिवार की थीं। काज़ी ने घर को दुबारा बनाने के लिए कर्ज की मांग के लिए अपनी ससुराल जाने की ठानी। उन्होंने शैतानी से दूर रखने के लिए शेख चिल्ली को भी घोड़े पर अपने साथ ले लिया।

काज़ी की ससुराल कोई पचास मील दूर होगी। बीच में काज़ी को दस्त लगे और उन्हें शौच के लिए जंगल में जाना पड़ा। तभी सड़क पर से एक काफिला गुज़रा। वो शेख चिल्ली को ही घोड़े का असली मालिक समझ बैठे।

“हम तुम्हें इस घोड़े के लिए 200 रुपए देंगे,” उन्होंने उससे कहा। “क्या तुम इतने में उसे बेचोगे?”

“हां,” शेख ने कहा। उसने पैसों को रखा और घोड़े की थोड़ी सी पूंछ काटी और फिर ज़मीन में एक गड्‌ढा करके उसने पूंछ के बालों को उसमें गाढ़ दिया।

“सरकार, ज़रा जल्दी कीजिए!” वो काज़ी को आते देखकर ज़ोर से चिल्लाया। “अभी-अभी घोड़े को खींचकर इस चूहे के बिल में ले जाया गया है! अगर आप मेरी मदद करेंगे तो हम उसे खींचकर बाहर निकाल लेंगे!” काज़ी को कुछ समझ नहीं आया फिर भी वो शेख को पकड़े रहे। और शेख ज़मीन में गढ़ी घोड़े की पूंछ को खींचता रहा। अंत में पूंछ बाहर निकल आई परंतु शेख और काज़ी दोनों धड़ाम से ज़मीन पर जाकर गिरे !

“चूहे हमसे ताकतवर निकले, सरकार,” शेख ने दुखी अंदाज़ में कहा। “घोड़ा सीधा ज़मीन के अंदर चला गया है। अब हमें उसे बाहर निकालने के लिए फावड़ों के साथ खुदाई करने वाले ताकतवर लोग चाहिए होंगे!”

“तुम यह क्या बकवास बक रहे हो, बेवकूफ!” काज़ी गुस्से में चिल्लाए। “भला एक घोड़ा किसी चूहे के बिल में कैसे घुस सकता है? नमकहराम ! जल्दी से बताओ कि तुमने मेरे घोड़े का क्या किया है? घोड़ा कहीं खो गया है या तुमने उसे बेच डाला है? अब हम आगे का सफर कैसे करेंगे? पैदल?”

“सरकार, पास ही में एक गांव है जहां से आपको एक नया घोड़ा मिल सकता है,” शेख ने कहा। “एक घोड़े के गुम जाने से आप जैसे रईस आदमी को कोई फर्क नहीं पड़ेगा।”

बड़बड़ाते हुए काज़ी ने अगले गांव से एक और घोड़ा खरीदा और उसे एक पल के लिए भी अपनी आंखों से ओझल नहीं होने दिया! उन्होंने खुद तो घोड़े पर बैठकर यात्रा की और शेख को पहला घोड़ा खोने की सज़ा में पैदल दौड़ाया।

रात को वे एक सराय में रुके। काजी ने वहां खाना खाया और उसके बाद शेख की ओर कुछ सूखी रोटी फेंकते हुए कहा, “तुम रात भर उस घोड़े के साथ ही रहना। तुम उसकी मालिश करते रहना और खबरदार जो तुमने उसे अपनी आंखों के सामने से ओझल होने दिया! क्या तुम मेरी बात समझे?”

“जी सरकार,” शेख ने अपनी जंभाई को छिपाते हुए बड़े भीरू भाव में कहा। दिन भर चलने की थकान के बाद वो घोड़े के पास ही बैठ गया और धीरे-धीरे उसकी मालिश करने लगा। शेख को कब नींद आई और कब कोई घोड़े को चुराकर ले गया इसका उसे पता ही नहीं चला! वो जब सुबह उठा तो उसने घोड़े को नदारद पाया। शेख ने उसे चारों ओर ढूंढ़ा। अगर उसने घोड़े को जल्दी नहीं खोजा तो काज़ी उसकी चमड़ी उधेड़ कर रख देगा! फिर उसे घास के ढेर में जिसे घोड़ा खा रहा था दो लंबे कान नज़र आए।

“वाह!” शेख ने कानों को पकड़ते हुए कहा, “तो तुम यहां छिपे हुए थे!” वो कान एक खरगोश के थे। शेख जब उन्हें निहार रहा था तभी काज़ी भी वहां पहुंचे।

“घोड़ा कहां है?” काज़ी ने कड़कदार आवाज़ में पूछा। “यह रहा सरकार,” शेख ने झट से उत्तर दिया। “अबे गधे, यह तो खरगोश है, घोड़ा नहीं!”

“सरकार यह सच में घोड़ा है। मैंने घोड़े की इतनी कसकर मालिश की कि वो छोटा होकर खरगोश बन गया। मैंने उसके कानों की मालिश नहीं की। आप देखिए। वे अभी भी घोड़े के नाप के हैं!”

“तुम दुनिया के सबसे बड़े बेवकूफ हो!” काज़ी ने कहा। यह कहते हुए काज़ी की आवाज़ गुस्से से लड़खड़ाने लगी। “और मैं दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा बेवकूफ हूं कि मैंने तुम्हें नौकरी पर रखा! चलो अब तैयार हो क्योंकि अब चलने का वक्त हो गया है।”

वो बाकी रास्ते पैदल ही चल कर गए। ससुराल पहुंचने के बाद उनका काफी आदर-सत्कार हुआ।

काज़ी की सास शेख चिल्ली को अलग ले गयीं। “तुम्हारे मालिक की तबियत कुछ ठीक नहीं लगती है,” उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि लंबे सफर के कारण उन्हें कुछ थकान हो गई है।”

“उनका पेट कुछ खराब है,” शेख ने कहा।

“फिर मैं उनके लिए कुछ खिचड़ी बना देती हूं,” बूढ़ी औरत ने कहा।

“पर आप उसे खूब चटपटा बनाएं,” शेख ने कहा। “उन्हें चटपटा खाना बहुत पसंद है।”

रात को भोजन के समय शेख चिल्ली को सबसे स्वादिष्ट बिरयानी, मटन करी, सब्जियां और खीर परोसी गई। और काज़ी को केवल एक कटोरा भर मसालेदार खिचड़ी ही खाने को मिली !

काज़ी को इतनी भूख लगी थी कि वो सब खिचड़ी खा गए। रात को उनके पेट में दर्द हुआ और उन्हें तुरंत शौच के लिए जाना पड़ा।

“मुझे बाहर जाना है,” उन्होंने शेख को उठाया। “तुम भी मेरे साथ चलो।”

“सरकार,” शेख ने नींद में कहा, “वहां कोने में एक मिट्टी का मटका रखा है। आप उस का प्रयोग क्यों नहीं करते? सुबह को उसे खाली कर देंगे।”

काज़ी को रात में कई बार शौच जाना पड़ा। सुबह तक वो मटका आधा भर चुका था।
“इसे बाहर फेंक कर आओ,” उन्होंने शेख को आदेश दिया।

“मैं यह काम नहीं करूंगा,” शेख ने कहा, “मैं मेहतर नहीं हूं।”

काज़ी को कुछ समझ नहीं आया। गुस्से में आकर उन्होंने मटका उठाया और उसे जंगल में फेंकने चल पड़े। उनका साला उनके पीछे-पीछे दौड़ता हुआ आया। उसे आते हुए देख काज़ी ने शर्म के मारे अपनी रफ्तार बढ़ा दी। परंतु उनका साला तेजी से दौड़कर उनके पास पहुंच गया।

“भाईजान, आप अपने सिर पर यह बोझ लाद कर कहां जा रहे हैं? लाईए, मैं आपकी मदद करता हूं।”

“नहीं! नहीं!” काज़ी ने विरोध किया। “नहीं, ठीक है।” और काज़ी ने मटके को कस कर पकड़ने की कोशिश की। परंतु मटका उसके हाथों से फिसल कर उन दोनों के बीच में जाकर गिरा जिससे दोनों लोग गंदगी से सन गए।

शेख इस पूरे नज़ारे को खिड़की में से देख रहा था। “सरकार,” वो काज़ी की ओर दौड़ता हुआ चिल्लाया। “कहीं आपके चोट तो नहीं आई!”

काज़ी ने विनम्र भाव से अपने दोनों हाथ जोड़े। “मैं तुमसे विनती करता हूं शेख चिल्ली, तुम मुझे अकेला छोड़ दो,” उन्होंने कहा। “मैंने तुम्हें बहुत झेला है और बर्दाश्त किया है! तुम जीते। मैं हारा। मैं तुम्हें फौरन नौकरी से निकालता हूं। तुम पूरे साल की तनख्वाह ले लो और मेरे दोनों कान भी कुतर लो, परंतु मेरी निगाह के सामने से सदा के लिए दफा हो जाओ!”

“आप अपने कान अपने पास ही रखें, सरकार,” शेख ने कहा। “हां, यह रहे वो दो सौ रुपए जो मुझे आपका पहला घोड़ा बेचकर मिले। मुझे अफसोस है कि दूसरा घोड़ा खरगोश में बदल गया। उस रात आपने घोड़े की मालिश करने के लिए कह कर भारी गलती की!”

एक साल की पूरी तनख्वाह जेब में रखे शेख चिल्ली बड़ी जीत हासिल करके शान से घर लौटा !

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