एक दिन एक भद्र महिला शेखचिल्ली की दुकान में कुछ खरीदने के लिए आई। शेखचिल्ली उसे ब्लाउज के कपड़े, सूट-सलवार के कपड़े दिखाने लगा। उस महिला ने एक सूट का कपड़ा लिया और उस कपड़े के पैसे चुकाए। पैसे लेकर शेखचिल्ली अपने गल्ले के पास जा बैठा और गल्ले में से अपनी गोल टोपी निकालकर पहन ली। महिला ने जाते-जाते, ठमककर शेखचिल्ली की तरफ देखा और उसे पहचान गई। यह वही महिला थी जिसके घर में कुत्ते का पीछा करते हुए शेखचिल्ली घुस गया था और वहाँ से लौटते समय पलंग से सौ-सौ के नोटों की गड्डी उठाकर ले आया था। महिला ने उसे गुसलखाने से देखा था। उसकी नुकीली दाढ़ी और गोल टोपी उसे याद रह गई थी। घर से रुपए चोरी किए जाने की घटना की जानकारी उसने पुलिस को दे दी थी जिसमें उसने चोर का हुलिया भी बता रखा था।

महिला ने पूरे इत्मीनान के साथ शेखचिल्ली का चेहरा देखा और जब उसे यह तसल्ली हो गई कि यह वही आदमी है जो उसके घर से नोटों की गड्डी ले आया था तब वह उसकी दुकान से बिना कुछ कहे निकली। वह सीधा पुलिस थाने गई और वहाँ उसने पुलिस को जानकारी दे दी कि जिस चोर ने उसके घर से दस हजार रुपए चुराए थे, वह बाजार में कपड़े की दुकान चला रहा है।

महिला की सूचना के बाद पुलिस हरकत में आई और शेखचिल्ली के कपड़े की दुकान पर छापा मारकर उसे पकड़ लिया। पहले तो अपनी गिरफ्तारी से चकित हुआ लेकिन जब पुलिस ने उससे पूछताछ शुरू की तब उसकी समझ में आ गया कि मामला दस हजार रुपए का है। उसी दस हजार रुपए का जो वह एक घर से रोटी के एवज में उठा लाया था। उस रात को कुत्ता उसके हाथ से रोटी छीनकर भाग गया था और वह कुत्ते का पीछा करते हुए उस घर में जा घुसा था और पलंग पर रखी नोटों की गड्डी उड़ा लाया था।

पुलिस थाने में उससे पूछताछ करने लगी- “बताओ! तुमने उस भद्र महिला जुबैदा खातून का रुपया लिया था या नहीं?”

“मैं किसी भद्र महिला जुबैदा खातून को नहीं जानता।”

“तुमने किसी घर से पलंग पर रखे नोटों का बंडल चुराया।” थानेदार ने रौब डालते हुए पूछा।

“हाँ, एक कुत्ते के घर से! कुत्ता मेरी रोटी चुराकर भागा था। मैं कुत्ते के पीछे दौड़ता हुआ उस घर में घुसा था और कुत्ते को नहीं पकड़ पाने के कारण मैं वहाँ से रुपए लेकर भाग आया था।”

थानेदार ने शेखचिल्ली के जवाब से ही समझ लिया कि यह आदमी ईमानदार भी है और परले दर्जे का बेवकूफ भी।

दूसरे दिन दंडाधिकारी की इजलास में शेखचिल्ली की पेशी हुई और आदेश हुआ- ‘शेखचिल्ली की दुकान की नीलामी कर उस महिला के पैसे वापस कर दिए जाएँ और शेखचिल्ली को तीन महीने के लिए जेल भेज दिया जाए।’ दंडाधिकारी ने मामले की सुनवाई करते हुए आगे कहा- “शेखचिल्ली ईमानदार है। वह समझ रहा है कि वह रोटी के बदले रुपए ले आया है। उसकी बातों से प्रकट होता है कि उसे अपने अपराध का ज्ञान नहीं है। मगर उससे अनजाने ही सही, दंडनीय अपराध हुआ है जिसके कारण उसे सजा भुगतनी होगी। उसकी नेकचलनी और ईमानदारी के कारण उसे मात्रा तीन महीने की सजा ही बामशक्कत दी जाती है।”

इस तरह शेखचिल्ली की दुकान की नीलामी हो गई और शेखचिल्ली को जेल भेज दिया गया।

शेखचिल्ली के जेल जाने की खबर जब उसकी अम्मी रसीदा बेगम को मिली तो उसका कलेजा मुँह को आ गया। वह रोती कलपती भागी-भागी जेल पहुँची और शेखचिल्ली से मिलकर बिलख पड़ी।

शेखचिल्ली ने अपनी अम्मी को समझाया- “अम्मी! जो होना था सो हो गया। मैं अपनी पूर्व की स्थिति में आ गया हूँ। कोई बात नहीं है, अम्मी! जेल से निकलकर मैं जी लगाकर काम करूँगा और फिर बेहतर जिन्दगी जिएँगे हम सब। यह मेरा वादा है।”

अम्मी को विदा करके शेखचिल्ली अपने बीते दिनों को याद करने लगा।

दूसरे दिन जब उसकी अम्मी उससे मिलने आई तब उसने कहा- “अम्मी ! तुम रजिया को लेकर गाँव वापस चली जाओ। जेल से निकलने के बाद में गाँव आऊँगा तब सभी मिलकर सोचेंगे कि अब आगे क्या करना है।” थोड़ी देर चुप रहने के बाद शेखचिल्ली ने पुनः कहा- “अम्मी ! मुझसे मिलने एक दिन भी रजिया नहीं आई, क्या बात है? क्या वह मुझसे नाराज है?”

“नहीं बेटे! वह क्यों नाराज होने लगी? तुम्हारी गिरफ्तारी की वजह से वह मायूस है और अपने गम से हलकान है। मैं उसे कल लेकर आऊँगी। तू चिन्ता न कर।” शेखचिल्ली को ममता से निहारते हुए रसीदा बेगम ने कहा।

अपने बेटे से जेल में मिलकर जब रसीदा बेगम घर लौटी तब उसने अपनी बहू रजिया बेगम से बताया कि शेखचिल्ली उससे मिलना चाहता है तब अचानक रजिया बेगम फफक-फफककर रो पड़ी और बोली-“अम्मी, मुझसे यह बर्दाश्त नहीं होगा कि मैं अपने पति को जेल की सलाखों के पीछे देखूँ। जो गुनाह उन्होंने किया है उसकी सजा तो वे भोग रहे हैं और उनसे सम्बन्धित होने के कारण सारी दुनिया मुझे चोर की बीवी कहेगी और आपको चोर की अम्मी। यह मुझसे कतई बर्दाश्त नहीं होगा। मैं तो उनसे मिलने जेल किसी भी हालत में नहीं जाऊँगी।”

बहुत मनाने के बाद भी जब रजिया बेगम नहीं मानी तब रसीदा बेगम अकेले ही शेखचिल्ली से मिलने दूसरे दिन जेल पहुँची।

रसीदा बेगम को अकेले आया देख वह मन ही मन समझ गया कि रजिया बेगम उससे नाराज है। उसने अपनी अम्मी से कहा- “अम्मी! रजिया से कहना-मैं उसकी नजर में अच्छा इनसान बनकर लौटूँगा।”

इसके बाद रसीदा बेगम ने शेखचिल्ली को बताया कि वह मकान मालिक के पैसे चुकाकर उसका घर खाली करके गाँव लौट रही है। जेल से छूटने के बाद वह सीधे वहीं आए।

अपने बेटे से विदा लेकर रसीदा बेगम वापस लौट गाई। वह उदास थी और मायूस भी।

सास की उदासी को समझते हुए रजिया बेगम ने उससे कहा- “अम्मीजान! आप सोच रही होंगी कि मैं कितने कठोर दिल की हूँ कि जेल में बन्द अपने पति से मिलने नहीं गई। मगर अम्मी, वे इतने भोले और लापरवाह हैं कि उन्हें कभी अपनी गलतियों का अहसास भी नहीं होता है। मैंने यह कठोरता उन्हें समझदार बनाने के लिए अपना ली है। वे अब भी बच्चों जैसी हरकतं करते हैं… मुझे तो हैरत होती है।”

रसीदा बेगम ने रजिया की ओर देखा और उसे तसल्ली देती हुई बोलीं- “बहू! तुम्हारा कहना जायज है। अल्लाह करे कि शेखचिल्ली अब समझदारी से काम लेना सीख जाए। अगर उसने थानेदार के सामने सच की जगह झूठ बोल दिया होता तो यह आफत गले नहीं पड़ी होती। खैर! खुदा जो करता है, भले के लिए करता है।”

दूसरे दिन रसीदा बेगम अपनी बहू रजिया के साथ गाँव पहुँच गईं और अपनी सामान्य दिनचर्या में लग गईं। अभी उन्हें आए पन्द्रह दिन भी नहीं बीते थे कि गाँव में हैजा फैल गया और शेख बदरुद्दीन का उल्टियाँ करते-करते इन्तकाल हो गया।

रजिया बेगम सन्न रह गई ससुर की मौत से और रसीदा बेगम को काठ सा मार गया। भावशून्य अवस्था में ही रसीदा और रजिया ने सारे सगे-सम्बन्धियों को सूचना दी। शेख बदरुद्दीन को सुपुर्दे-खाक किया गया।

शेखचिल्ली को जब जेल में अपने अब्बू के इन्तकाल की खबर मिली तो वह फूट-फूटकर रोया और तीन महीना बीतने की बेकली से प्रतीक्षा करने लगा। अब उसके लिए अम्मी और रजिया की परवरिश के लिए कुछ करने की जरूरत आन पड़ी थी। किसी तरह तीन महीने की अवधि पूरी हुई। शेखचिल्ली जेल से बाहर आया और सीधे अपने गाँव पहुँचा।

अम्मी उससे लिपटकर फूट-फूटकर रोईं। मगर रजिया बेगम उससे कोई बात करने के लिए तैयार नहीं हुई। अम्मी के गुहार लगाने पर उसने कहा- “अम्मी ! पहले आप अपने बेटे को कहें कि जिन्दगी में कभी भी कोई चोरी नहीं करने की शपथ लें तब ही मैं उनसे बातें करूँगी, नहीं तो मैं उनकी ओर देखेंगी भी नहीं।”

बिना अम्मी के कुछ बोले ही शेखचिल्ली ने रजिया बेगम के सामने शपथ ली कि वह जीवन में कभी भी किसी की कोई चीज नहीं चुराएगा, तब रजिया बेगम का गुस्सा शान्त हुआ और वह उससे लिपटकर देर तक रोती रहीं।

शेखचिल्ली उसके सिर पर थपकियाँ देकर उसके शान्त होने का इन्तजार करता रहा और जब वह शान्त हुई तो उसे बाँहों में लेकर अपने कमरे में चला गया। एक अरसे बाद शेखचिल्ली अपने घर में चैन की नींद सोया।

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