शेखचिल्ली का दो-मंजिला मकान क्या बना कि उसके उमंगों के पर निकल आए। वह जब भी मौका मिलता, शेखी बघारने से नहीं चूकता। गाँव के लड़कों में भी उसकी धाक जम गई थी। वह जब भी घर से बाहर निकलता तो उसके हम उम्र लड़के उसके इर्द-गिर्द मँडराने लगते। इधर एक नई अदा भी सीख ली थी शेखचिल्ली ने। वह एक गोल टोपी लगाकर ही घर से बाहर निकलता था और जब कभी भी कोई साथी उसे टोकता तो वह अपने सिर की टोपी को जरा-सा घुमाकर उसकी बातों का जवाब देता।
एक दिन शेखचिल्ली अपने कुछ साथियों के साथ अपने गाँव के चैराहे पर बने चबूतरे पर बैठा हुआ इधर-उधर की बातें कर रहा था। तभी एक अजनबी आदमी वहाँ पर आकर रुक गया और लड़कों से मुखातिब होकर बोला- “क्यों बच्चो, क्या यही सड़क शेख साहब के घर जाएगी।”
शेखचिल्ली को उस व्यक्ति का सवाल सुनकर मसखरी सूझी और वह तुरन्त बोल पड़ा- “नहीं जनाब! शेख साहब के घर न यह सड़क जाती है और न वह सड़क जाती है।”
वह व्यक्ति हैरत में डूबकर बोला- “क्या बात कर रहे हो बेटे? ऐसा कैसे हो सकता है? बारह साल पहले मैं यहाँ आया था… अभी भी बहुत कुछ वैसा ही है-इस गाँव का। तुम समझ तो रहे हो-शेख साहब से मेरा मतलब शेख बदरुद्दीन से है। क्या शेख बदरुद्दीन इस गाँव में नहीं रहते?”
शेख बदरुद्दीन का नाम सुनकर शेखचिल्ली चैंका तो जरूर मगर दोस्तों के बीच रौब गालिब करने के लिए फिर उसी अन्दाज में बोला- “शेख बदरुद्दीन तो इसी गाँव में रहते हैं जनाब! मगर ये सड़कें इसी तरह यहीं पड़ी रहती हैं जनाब! कहीं आती-जाती नहीं।”
शेखचिल्ली की बातें सुनकर वह आदमी थोड़ा झेंप-सा गया और झेंपते हुए ही शेखचिल्ली से कहा- “हाँ, बेटे! सड़कें खुद नहीं चलतीं। उन पर चलकर मुसाफिर एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाते हैं… अब मुझे यह बता दो कि किस सड़क से चलकर जाऊँ कि मैं शेख बदरुद्दीन के घर पहुँच जाऊँ!”
शेखचिल्ली की मसखरी का अन्दाज अब थोड़ा कम हो चला था। उसने उस व्यक्ति से पूछा- “मगर जनाब! आप शेख बदरुद्दीन साहब के घर क्यों जाना चाहते हैं?”
“शेख बदरुद्दीन मेरे बचपन का दोस्त है। कभी हम दोनों साथ-साथ खेला करते थे। मगर वक्त ने हमें अलग-अलग रहने को मजबूर कर दिया। वह तो मेरा सबसे अजीज दोस्त हुआ करता था किन्तु वक्त का कुछ ऐसा चक्कर चला कि उसके अब्बा अपना पूरा परिवार साथ लेकर इस गाँव में बस गए। बारह साल पहले जब शेख बदरुद्दीन के घर एक जलसा हुआ तब मैं अपने पूरे परिवार के साथ उसके पास आया था।”
अब शेखचिल्ली को लगा कि इस इनसान से मसखरी करना ठीक नहीं है इसलिए तुरन्त बेहद शालीन अन्दाज में बोला- “जनाब! आप पहले तो मेरा आदाब कबूल फरमाइए फिर मैं आपको शेख साहब के घर ले चलूँगा। शेख साहब मेरे अब्बा हुजूर हैं।”
शेखचिल्ली की शालीनता से वह आदमी प्रभावित हुआ और बोला- “खुश रहो बरखुरदार! तुम्हारी हाजिरजवाबी का कायल हुआ। बहुत अच्छा लगा तुमसे मिलकर। शेख साहब ने तुम्हें अच्छी तालीम दी है। खुदा तुम्हें कामयाबी बख्शे।”
शेखचिल्ली एक अजनबी इनसान से अपनी तारीफ सुनकर बहुत खुश हुआ और बोला- “चलिए जनाब! मेरे साथ चलिए। मैं आपको बागानवाली सड़क से लेकर चलता हूँ। अगर अब्बू बागान में होंगे तो दिख जाएँगे, नहीं तो घर पर आपकी उनसे मुलाकात जरूर हो जाएगी।”
वह व्यक्ति शेखचिल्ली के साथ चलने लगा। शेखचिल्ली चुपचाप चल रहा था और आदत के अनुसार थोड़ी-थोड़ी देर पर अपनी टोपी घुमा देता था।
उस व्यक्ति ने उसे बार-बार टोपी घुमाते देखकर पूछा- “क्या बात है, बेटे, अपनी टोपी को तुम बार-बार घुमाते क्यों हो? क्या तुम्हारे सिर में खुजली हो रही है?”
“बिलकुल नहीं जनाब! बस, मैं यह सोच रहा था कि दुनिया गोल है जैसे मेरी टोपी गोल है। जिन्दगी इधर से गुजरे या उधर से-पहुँचती कहाँ है, कोई समझ नहीं पाता। यह टोपी घूम गई फिर भी देखने में वैसी की वैसी… इसका न कोई आगे का भाग है और न पीछे का…”
वह व्यक्ति शेखचिल्ली के मुँह से फलसफाने अन्दाज में इस तरह की बातें सुनकर बहुत प्रभावित हुआ और बोला- “वाह, बेटे ! इतनी छोटी उम्र में तुम्हें जिन्दगी का अच्छा तजुर्बा है। शेख साहब ने तुम्हें अच्छी परवरिश दी है… मैं तो तुम्हारी सोच का कायल हुआ।”
अब तक बागान का इलाका आ चुका था। शेखचिल्ली बागान की तरफ देखते हुए बोला-“जनाब, आप भी बागान में झाँकते चलें, शायद अब्बा दिख जाएँ। अब्बा या तो बागान में रहते हैं या फिर घर में और कहीं आते-जाते नहीं हैं!” बागान का इलाका समाप्त हो जाने के बाद शेखचिल्ली ने उस व्यक्ति से कहा- “अब्बा बागान में नहीं हैं। इसका मतलब है कि वे घर में ही होंगे। आगे वाले मोड़ से दस कदम की दूरी पर हमारा घर है… अब एक फर्लांग ही समझिए !”
वह व्यक्ति मुस्कुराकर शेखचिल्ली की तरफ देखने लगा और बोला- “बेटे, मैं देख रहा हूँ, तुममें शेख साहब के बहुत सारे गुण हैं। तुम्हारे अब्बा भी समय और दूरी का अन्दाज लगाकर चला करते थे। कहीं भी देर से पहुँचना उन्हें अच्छा नहीं लगता था।”
बातचीत करते हुए शेखचिल्ली उस व्यक्ति के साथ अपने घर आ गया। उस व्यक्ति को अपने पक्के मकान में अब्बा के लिए सुरक्षित कमरे में ले जाकर बैठाकर उसने कहा- “मैं अभी अब्बा को बुलाता हूँ शायद वे ऊपर हैं।”
इतना कहकर शेखचिल्ली वहाँ से चला गया। वह व्यक्ति उस कमरे में रखी पुरानी नक्काशीदार कुर्सियों, गाव-तकियों से सजे दीवान, मेहराबदार खिड़कियों और आबनूस के बने दरवाजों को देख रहा था तभी शेख बदरुद्दीन ने कमरे में प्रवेश किया और उस व्यक्ति को देखकर हैरत से बोल पड़े- “अरे महमूद मियाँ… तुम ! अल्लाह कसम ! मुझे तसव्वुर में भी यह खयाल नहीं आया कि तुमसे इस तरह मुलाकात होगी।”
महमूद मियाँ कुर्सी से उठ खड़े हुए और शेख बदरुद्दीन से गले मिले और फिर दोनों दोस्त बातें करने लगे। इसी बीच शेखचिल्ली दो गिलास शर्बत लेकर कमरे में पहुँचा और उन दोनों के सामने रख दिया। उस वक्त वे दोनों बहुत अजीजी से गुफ्तगू कर रहे थे।
शेखचिल्ली को वहाँ आया देख महमूद मियाँ ने कहा- “बदरुद्दीन! मुझे तुम्हारा बेटा बहुत पसन्द आया। इसकी बातों में इतनी गहराई है कि सुनकर हैरत होती है। मैंने इस उम्र के लड़कों को कभी इतनी ऊँची और बेहतरीन खयालातवाली बात करते नहीं सुनीं।”
अपनी तारीफ सुनता हुआ शेखचिल्ली धीरे-धीरे कदम बढ़ाता हुआ कमरे से बाहर हो गया।
दूसरे दिन सुबह शेखचिल्ली की अम्मी ने उसे जगाया और बोलीं- “बेटे, जा, हलवाई की दुकान से दो-तीन तरह की मिठाइयाँ मिलवाकर सेर-भर मिठाई और एक सेर दूध ले आ। महमूद साहब की अच्छी खातिरदारी करनी है। यह तुम्हारे अब्बा का हुक्म है।”
अलसाए हुए शेखचिल्ली ने उबासियाँ लेते हुए कहा- “अम्मी, मुझे सोने दो। अब्बा खुद चले जाएँ मिठाई और दूध लाने। खातिरदारी उनके दोस्त की होनी है… मेरी नींद क्यों खराब करती हो?”
“बेटे! उनके दोस्त अब तुम्हारे ससुर बननेवाले हैं। उठ, तुम्हारे साथ हम लोग कल ही उनकी बेटी को देखने जाएँगे और खुदा ने चाहा तो जल्दी ही उनकी बेटी का निकाह तुम्हारे साथ हो जाएगा।”
अम्मी की बातें सुनकर शेखचिल्ली के पूरे जिस्म में एक सनसनी-सी दौड़ गई… उसकी आँखों की नींद गायब हो गई और वह हैरत के उबाल में बिस्तर पर बैठ गया और पूछा- “अरे अम्मी! क्या कह रही हो तुम !”
“हाँ, बेटे! महमूद साहब तुम पर फिदा हो गए हैं। तुम्हारे अब्बू से कह रहे थे कि तुमसे अच्छा नौजवान वे अपनी बेटी रजिया के लिए लाख कोशिश भी करें तो नहीं तलाश सकते। वे चाहते हैं कि जल्दी-से-जल्दी तुम्हें अपना दामाद बना लं। आज वे लौट जाएँगे और हम लोगों की अगवानी का इन्तजाम करेंगे। कल हम लोग उनके घर जाएँगे। तुम्हारी होने वाली बीवी को देखने। सबकुछ ठीक रहा तो जल्दी ही तुम्हारी शादी उनकी बेटी से हो जाएगी और तुम्हारे अब्बू की बचपन की दोस्ती रिश्तेदारी में बदल जाएगी।”
शेखचिल्ली आनन-फानन में बिस्तर से उठा और हलवाई की दुकान से मिठाई और दूध लेकर आ गया। महमूद साहब की जोरदार मेहमाननवाजी हो, इसके लिए उसने जी-जान लगा दी।
दूसरे दिन उनकी बेटी को देखने-छेकने की रश्म अदायगी भी हो गई और महीने-डेढ़ महीने में शेखचिल्ली का विवाह भी हो गया।
जब शेखचिल्ली अपनी दुलहन के साथ अपने घर आ रहा था तब गाँव के उस चैराहे पर पहुँचकर उसने अपनी बेगम से कहा- “यही चैरस्ता है- देखो, यहाँ से चार राहें चार दिशाओं में जाती हैं मगर मेरे लिए इस चैरस्ते ने तुम्हारे घर का द्वार खोला और तुम्हारे लिए मेरे घर पहुँचने का रास्ता बना दिया… मगर क्या करूँ, तुम मेरी बात अभी नहीं समझोगी! तुम्हारे अब्बा होते तो समझ भी जाते।”
उसकी बेगम ने घूँघट की ओट से उस चैराहे का नजारा लिया और फिर घूँघट में खुद को समेट लिया।
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