शेखचिल्ली अपनी बीवी रजिया बेगम और अपनी अम्मी के साथ कुछ दिनों तक चैन से रहा। अब्बू के नहीं होने से उसे सब कुछ अजीब-सा लग रहा था। घर मंळे हर जगह कुछ न कुछ उसे ऐसा जरूर दिख जाता था जिससे उसे अपने अब्बू की याद आ जाती थी। अब्बू की याद के अलावा अगर उसे कोई चीज परेशान कर रही थी तो वह थी उसकी बेरोजगारी।
शेखचिल्ली ने शहर या जेल से लौटने के बाद अपने गाँव में जो भी दिन बिताए थे, उन दिनों में वह इसी गुन-धुन में लगा रहा था कि अब वह करे भी तो क्या करे! गाँव में तो लकडियाँ काटने, कुदाल चलाने, खेत- बागान की रखवाली करने जैसे ही काम थे। ये काम ऐसे नहीं थे जिसे करके वह अपने घर की परवरिश कर पाता। उसे ऐसे काम की जरूरत थी जिसे करके वह इतने पैसे हासिल कर सके जिससे उसकी अम्मी और बेगम की हसरतें पूरी हो सकें।
शेखचिल्ली अभी इसी उधेड़बुन में पड़ा था कि एक शाम उसके गाँव में सरकार की तरफ से एक फिल्म दिखाने के लिए कुछ लोग आए। पूरे गाँव में डुगडुगी पिटवा दी गई कि जो भी चाहे वह नाच – गानों से भरपूर वह फिल्म देखने को मदरसा-मैदान में एकत्रित हो जाए। फिल्म शाम को छह बजे शुरू होगी और रात के नौ बजे खत्म होगी।
मुनादी शेखचिल्ली ने भी सुनी। उसने सोचा-चलो, आज की शाम मजे में कट जाएगी। मुफ्त में फिल्म देखने को मिलेगी। अम्मी को बताकर कि मदरसा-मैदान में सरकार की तरफ से सिनेमा दिखाया जा रहा है, शेखचिल्ली ठीक छः बजे मदरसा-मैदान पहुँच गया।
मैदान में दरी बिछाकर लोगों के बैठने की व्यवस्था की गई थी। मदरसे की एक दीवार पर सिनेमा दिखाने का पर्दा लगा हुआ था। देखते-देखते मदरसा-मैदान लोगों से भर गया और पर्दे पर रोशनी पड़नी शुरू हो गई। शेखचिल्ली के लिए यह किसी अजूबे से कम नहीं था। फिल्म शुरू होते ही उसका मुँह खुला का खुला रह गया-वल्लाह! यह तो वैसी ही फिल्म है जैसी सिनेमा हॉल में दिखाई जाती है। मन-ही-मन अचरज में डूबता हुआ वह पूरी फिल्म दीवानगी के आलम में देख गया। उस फिल्म में नायक का एक सहयोगी उसी की तरह हल्की नुकीली दाढ़ी और गोल टोपी पहने हुए था। शेखचिल्ली को यह किरदार बहुत पसन्द आया और उसने फिल्म देखते देखते ही तय कर लिया कि वह फिल्मों में काम करेगा।
फिल्म खत्म होने के बाद सभी लोग अपने-अपने घरों को वापस चले गए मगर शेखचिल्ली वहीं बैठा रहा। फिल्म दिखानेवाले लोग पर्दा उतारने लगे तब शेखचिल्ली उनके पास गया और उनसे पूछा- “जनाब! आपने यह फिल्म कहाँ और कैसे बनाई?”
वे लोग बोले-“भइया! ये फिल्म मैंने नहीं बनाई। हम तो सरकार के सूचना एवं प्रसारण विभाग के मुलाजिम हैं। लोगां को मनोरंजन प्रदान करने के उद्देश्य से सरकार ने फिल्म दिखाने का कार्यक्रम शुरू किया है। उसी कार्यक्रम के तहत हम यह फिल्म आप लोगों को दिखाने आए थे।”
“देखिए जनाब ! चाहे जो हो, इतना तो तय है कि आप लोग फिल्म विभाग से जुड़े हैं। मुझे बस इतना बता दीजिएगा कि मुझे फिल्मों में काम कैसे मिलेगा। आप लोगों की पहचान तो फिल्म बनानेवालों से जरूर होगी। अगर आप लोग मुझे फिल्मों में काम दिलवा दें तो बड़ी मेहरबानी होगी।”
शेखचिल्ली की बात सुनकर वे लोग हँसने लगे।
शेखचिल्ली समझ नहीं पाया कि आखिर ये लोग हँस क्यों रहे हैं? शेखचिल्ली धैर्यपूर्वक उन सबों का चेहरा बारी-बारी से देखता रहा। उसे अचरज में डूबा देखकर उनमें से एक व्यक्ति ने संजीदा होते हुए कहा- “मियाँ! फिल्में तो बम्बई में बनती हैं। तुम्हें फिल्मों में काम करना है तो यहाँ क्या कर रहे हो? बम्बई जाओ।”
शेखचिल्ली ने उस आदमी का शुक्रिया अदा किया और अपने घर वापस लौट आया।
जिस समय वह अपने घर पहुँचा उसकी अम्मी और बेगम दोनों जगी हुई थीं और आँगन में बैठकर गप्पें लगा रही थीं। शेखचिल्ली ने उनके पास पहुँचकर कहा- “अम्मी! मैंने तय कर लिया है कि मैं फिल्मों में काम करूँगा। इसके लिए मुझे बम्बई जाना होगा। मैं कल ही बम्बई चला जाऊँगा।”
उसकी अम्मी और बेगम दोनों ने आश्चर्य से उसकी तरफ देखा। उसकी अम्मी ने चकित होकर उससे कहा-“अरे, आज अचानक तू सिरफिरों जैसी बातें क्यों कर रहा है? अचानक बम्बई जाने की सनक तुझ पर कैसे सवार हो गई? किसने तुम्हारे दिमाग में यह बात भर दी?”
“अम्मी! मेरे मन में खुद-ब-खुद यह खयाल आया है कि मुझे बम्बई जाना चाहिए। मेरा कान कौन भरेगा और अम्मी ! मैं यह बात किसी सनक में नहीं कह रहा हूँ। मेरे भीतर से यह आवाज आ रही है कि शेखचिल्ली, तू इस गाँव में बैठा क्या कर रहा है? तुम्हारा इन्तजार बम्बई में हो रहा है। मुझे विश्वास है अम्मी कि बम्बई पहुँचने पर मुझे काम जरूर मिलेगा और वह भी फिल्मों में।” शेखचिल्ली ने कहा।
अम्मी ने उसे बहुत समझाया मगर वह अपनी जिद पर अड़ा रहा। जब वह सोने के लिए अपने कमरे में गया तो उसकी बेगम ने भी उसे समझाया कि फिल्मों में काम मिलना आसान नहीं होता। मगर शेखचिल्ली तो शेखचिल्ली था, कैसे उसे अपनी बेगम की बात समझ मं आती? अन्ततः अम्मी और उसकी बेगम ने दूसरे दिन उसे बम्बई जाने की इजाजत दे दी।
शेखचिल्ली बन-सँवरकर अपने घर से निकला। रेलवे स्टेशन पहुँचकर उसने वहाँ के लोगां से पता किया कि बम्बई जाने के लिए उसे क्या करना होगा। लोगों ने उसे टिकट खिड़की दिखाते हुए कहा -“पहले तो उस खिड़की से बम्बई जाने के लिए टिकट खरीदो फिर जब बम्बई जानेवाली ट्रेन आ जाए तब उसके किसी डिब्बे में बैठ जाना और जब बम्बई आ जाए तो डिब्बे से उतर जाना और जहाँ जाना होगा, वहाँ चले जाना।”
शेखचिल्ली बम्बई का टिकट खरीदने के लिए जब टिकट खिड़की पर गया तब वहाँ भी उसने कुछ ऐसा किया कि वहाँ खड़े लोग हँसने लगे और वह उन तमाम हँसनेवालों की तरफ देखने लगा कि आखिर वे लोग हँस क्यों रहे हैं और जब उसे कुछ भी समझ में नहीं आया तब खुद भी हँसने लगा-यह सोचकर कि यदि वह नहीं हँसा तो लोग उसे नासमझ समझेंगे।…
हुआ यह कि बम्बई का टिकट माँगने पर टिकट बुकिंग क्लर्क ने उससे 4 पाँच रुपए बारह आने की माँग की तो शेखचिल्ली ने उससे कहा- “अरे भाई! इतना महँगा है टिकट? कुछ कम करो तो लें भी।” मानो वह सब्जीवाले से मोल-भाव कर रहा हो !
टिकट क्लर्क ने उसे झिड़क दिया- “क्यों मजाक कर रहे हो भाई साहब? टिकट लेना हो तो पैसे निकालो, नहीं तो खिड़की से हट जाओ।”
शेखचिल्ली ने समझ लिया कि टिकट क्लर्क बम्बई के टिकट का पाँच रुपए बारह आने ही लेगा। तब उसने टिकट क्लर्क को उतने पैसे गिनकर दे दिये और उससे बम्बई का टिकट लेकर ट्रेन आने की प्रतीक्षा में प्लेटफार्म पर बैठ गया।
ट्रेन आने पर कुछ डिब्बों में उसने खचाखच भीड़ देखी मगर भीड़ भाड़वाले डिब्बों के अलावा उसे उसी ट्रेन में एक डिब्बा ऐसा भी दिखा जिसमें बिल्कुल भीड़ नहीं थी। वह उसी डिब्बे में चढ़ गया।
ट्रेन खुली। शेखचिल्ली एक सीट पर बैठकर सोचने लगा-इस ट्रेन की सीट तो बड़ी गद्देदार है। मजा आ रहा है इस गद्देदार सीट पर बैठकर। ट्रेन अभी कुछ दूर ही गई होगी कि शेखचिल्ली का टिकट देखने के लिए टी.टी.ई. पहुँच गया। शेखचिल्ली ने टी.टी.ई. से भी झड़प कर ली-“क्यों भाई? क्यों दिखाऊँ तुम्हें टिकट?”
जब उसने बताया कि सरकार की ओर से उसे इस ट्रेन मं यात्रा करने वालों का टिकट देखने के लिए बहाल किया गया है और यदि वह उसे टिकट नहीं दिखाएगा तो मजबूर होकर वह उसे गिरफ्तार कर जेल भेज देगा।
जेल की धमकी सुनकर उसकी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई। उसने तुरन्त अपना टिकट निकालकर टी.टी.ई. को थमा दिया। टी.टी.ई. ने टिकट देखकर उससे कहा- “अब समझ में आया मियाँ कि तुम मुझे टिकट क्यों नहीं दिखा रहे थे। टिकट तुमने लिया है थर्ड क्लास का और सफर कर रहे हो फस्ट क्लास में। निकालो चार रुपए और। तुम्हें फरुट क्लास की कीमत चुकानी होगी।”
चार रुपए की माँग पर शेखचिल्ली के हाथ-पैर फूल गए। उसने कहा- “अरे भाई, पहले मुझे यह थर्ड क्लास और फस्ट क्लास का भेद तो समझाओ। पूरी की पूरी ट्रेन ही बम्बई जा रही है। फिर यह थर्ड क्लास और फरुट क्लास का क्या चक्कर है?”
टी.टी.ई. ने उसे समझाया-‘भाई, फरुट क्लास की सीटें गद्देदार हैं और अधिक सुविधाजनक। थर्ड क्लास में तो तुम्हें पटरे पर बैठना पड़ता है।”
“तो हटा ले अपना गद्दा। मैं पटरे पर ही बैठ लूँगा। क्यों मुझे लूटने की कोशिश कर रहे हो?” शेखचिल्ली ने कहा।
टी.टी.ई. इस मुसाफिर से हलकान हो चुका था। उसने डपटते हुए कहा- “मियाँ, अब बन्द भी करो ड्रामा और चार रुपए देकर अपना टिकट बदलवाओ, नहीं तो अगले स्टेशन पर मैं तुम्हें रेलवे पुलिस के हवाले कर दूँगा। जब जेल जाना पड़ेगा तो खुद समझ में आ जाएगा कि किसी सरकारी मुलाजिम से काम के वक्त मसखरी करने का नतीजा क्या होता है!”
शेखचिल्ली ने जैसे ही जेल की धमकी सुनी तो उसके शरीर से पसीना छलछला आया। उसने तुरन्त जेब में हाथ डाला और चार रुपए निकालकर टी.टी.ई. को थमा दिया।
टी.टी.ई. ने उसे चार रुपए की रसीद थमा दी और कहा- “अब करो आराम से फरुट क्लास में सफर !”
शेखचिल्ली मन-ही-मन जोड़ रहा था-पूरे नौ रुपए बारह आने लग गए बम्बई का टिकट बनवाने में। इसके बाद वह अल्लाहताला को याद कर मन-ही-मन विनती करने लगा-‘या मेरे खुदा! अब रास्ते में कोई और इस टिकट में इजाफा करनेवाला न आ धमके। पूरे नौ रुपए बारह आने खर्च हो चुके हैं। मेरे मौला! अपने बन्दे पर रहम करना।’
इसी तरह खुदा-खुदा करते हुए शेखचिल्ली बम्बई पहुँच गया। बम्बई सेंट्रल रेलवे स्टेशन पर ट्रेन रुकी और वह ट्रेन से उतरा तो वहाँ की भीड़ देखकर उसके होशो-हुवास गुम हो गए-‘बाप रे! कितनी भीड़ है यहाँ? कितना बड़ा रेलवे स्टेशन है यहाँ का?’ सोचते हुए वह जिधर नजर दौड़ाता, उधर ही उसे लोगों का सैलाब-सा उमड़ता दिखता। अन्ततः शेखचिल्ली ने अपना मन मजबूत किया और भीड़ के साथ चलता हुआ रेलवे स्टेशन से बाहर आ गया। असबाब के नाम पर उसके पास एक झोला था। वह चलता रहा, चलता रहा, चलता रहा। उसकी आँखों के सामने से बड़ी-बड़ी इमारतं गुजरती रहीं। उसने अपने जीवन में इतनी ऊँची इमारतों की कल्पना नहीं की थी जितनी ऊँची इमारतें उसे हकीकत में देखने को मिल रही थीं।
भटकते-चलते वह गेट वे ऑफ इंडिया पहुँच गया। वहाँ उसे सैलानियों की भीड़ देखने को मिली। चलते-चलते शेखचिल्ली बहुत थक गया था इसलिए वह वहीं एक सुरक्षित स्थान देखकर पाँव फैलाकर बैठ गया। उसे भूख भी लगी थी इसलिए उसने एक पावभाजी बेचनेवाले लड़के से पावभाजी खरीदकर खाया और फिर वहीं पर लेट गया।
वह थोड़ी देर ही सो पाया था कि किसी आदमी ने उसके पाँव को हिलाना शुरू कर दिया। पाँव हिलाए जाने से शेखचिल्ली की नींद खुल गई। वह हड़बड़ाकर उठ बैठा। पूरी तरह नींद खुलने पर उसने देखा कि एक गोल-मटोल-सा सम्पन्न आदमी उसका पाँव पकड़ते कह रहा है-“बाबा का वचन सच हुआ। मिल गया मेरी फिल्म का हीरो।”
शेखचिल्ली ने झटककर अपना पाँव छुड़ाया और खीज-भरे स्वर में पूछा- “क्यों बे? मुझे कच्ची नींद से क्यों जगाया? मैं कितना हसीन ख्वाब देख रहा था! मैं अपनी हीरोइन के साथ बाग में गाना गा रहा था। तुमने मेरा पैर हिलाकर सब गुड़-गोबर कर दिया।”
“अरे, नहीं जनाब! आप नाराज न हों। मैं फिल्म का प्रोड्यूसर-डायरेक्टर हूँ। मुझे अपनी फिल्म के लिए नए चेहरे की तलाश थी। मैं अभी-अभी बाबा घोंघड़मल के दर्शन करके आया हूँ। बाबा के कहने पर ही मैं गेट वे ऑफ इंडिया आया। बाबा ने कहा कि गेट वे ऑफ इंडिया के पास एक युवक गोल टोपी पहने लेटा होगा, उसकी हलकी नुकीली दाढ़ी होगी। उसी युवक को अपनी फिल्म में हीरो बनाऊँगा तब मेरी फिल्म सिल्वर जुबली मनाएगी और बॉक्स ऑफिस के सारे रिकॉर्ड तोड़ेगी। आप मुझे यहाँ ठीक वैसे ही मिले जैसे बाबा घोंघड़मल ने बताया था… मेरी तो तकदीर सँवर गई-हा-हा-हा! किसी ने ठीक ही कहा है कि खुदा जब देता है तो छप्पर फाड़ के देता है।”
शेखचिल्ली ने जब जाना कि यह मोटा-मुटल्ला आदमी खुद फिल्म बनाता है और उसे अपनी फिल्म में हीरो बनाना चाहता है तब वह बहुत खुश हुआ और बोला- “जनाब! जब आप मुझे अपनी फिल्मों में हीरो बनाना चाहते हैं तो फिर मेरे पाँव क्यों पकड़ रहे हैं? मुझे मौका दीजिए। मुझे आपका पाँव पकड़ना चाहिए।”
“अरे नहीं, यह ठीक नहीं होगा। सिल्वर जुबली मनानेवाली फिल्म के हीरो का तो कोई भी निर्माता पाँव पकड़ना चाहेगा। यदि मैंने पकड़ा तो क्या कमाल किया!”
तुरन्त निर्माता ने एक फॉर्म निकाला और शेखचिल्ली के सामने रखते हुए कहा- “जनाब हीरो साहब! यह लीजिए। इस फॉर्म में यहाँ दस्तखत कर दीजिए।”
शेखचिल्ली ने पूछा- “क्यों? क्यों कर दूँ दस्तखत?”
“आप दस्तखत करेंगे इसलिए कि यह शर्तनामा यह बताने के लिए है कि आप हमारी फिल्म में बतौर हीरो काम करेंगे। और यह लीजिए एक हजार रुपए-आपकी साइनिंग एमाउंट।” शेखचिल्ली को रुपया थमाते हुए उस गोल-मटोल-से आदमी ने कहा।
रुपए देखकर शेखचिल्ली की बाछें खिल गईं। उसने तुरन्त कलम ली और उस फॉर्म पर दस्तखत किया और गोल-मटोल-से आदमी के हाथों से रुपए लिये और पूछा-“एक हजार ही हैं न?”
उस गोल-मटोल आदमी को लगा कि शेखचिल्ली इस रकम को कम बता रहा है इसलिए वह तुरन्त बोला-“जनाब! आप पैसों की परवाह मत कीजिए। यह तो ‘टोकन मनी’ है। आपको मुँहमाँगी रकम दी जाएगी। पैसे देने में इस झाड़ईवाला की पूरी इंडस्ट्री में कोई सानी नहीं है। बस, अब आप मेरी गाड़ी में बैठ जाएँ। आपको अब फिल्म के किरदार के हिसाब से तैयार किया जाएगा। इसके लिए आपके बाल-दाढ़ी को करीने से सजाया जाएगा। ड्रेसर के पास आपके नए कपड़ों के नाप भी दिए जाएँगे। आप गाड़ी मं बैठें… गाड़ी में ही आपको सारी बातें समझा दी जाएँगी।”
शेखचिल्ली उसके साथ उसकी कार में जा बैठा। गोल-मटोल व्यक्ति उसे लेकर सैलून में गया। सैलूनवाले ने शेखचिल्ली का बाल काटा, फिर दाढ़ी बनाई। शेखचिल्ली ने अपना चेहरा आईने मं देखा तो दंग रह गया। खुद को इतना खूबसूरत उसने इससे पहले कभी नहीं देखा था। वह प्रसन्नचित्त होकर कार में लौट आया।
कार में प्रोड्यूसर डायरेक्टर मिस्टर झाडूवाला ने उससे कहा- “जनाब शेख साहब! अब लगे हाथ आपके कपड़ों का भी इन्तजाम हो जाए। मेरी फिल्म का हीरो सूट पहनता है, बूट पहनता है और टाई लगाता है। अभी अपन चलते हैं रेडीमेड की दुकान में और आप पर जँचनेवाले सूट-बूट-टाई का इन्तजाम करते हैं।”
कार एक शानदार रेडीमेड कपड़ा की दुकान पर रुकी। मिस्टर झाडूवाला शेखचिल्ली को साथ लेकर सीधे दुकान में गया और उसको बेहतरीन से बेहतरीन सूट-बूट में सजाकर लाने का हुक्म दिया।
ट्रायल रूम से निकलकर जब शेखचिल्ली बाहर आया तो मिस्टर झाडूवाला उसे प्रशंसाभरी निगाहों से देखता हुआ बोला- “हाउ हैंडसम ! आप तो सभी हीरों की छुट्टी कर दोगे जनाब! मेरी फिल्म हिट होने दो। देखना, सारी इंडस्ट्री तुम्हारा कदम चूमेगी।”
शेखचिल्ली को लेकर झाडूवाला कार में बैठ गया और शेखचिल्ली से कहा- “अपन अब सीधे शूटिंग साइट पर चलते हैं। वहाँ एक ‘रेप सीन’ से शूटिंग शुरू होगी। फिल्म का विलेन हीरोइन के साथ ‘रेप’ करने की कोशिश करेगा और हीरो उस हीरोइन को बचाने के लिए कूदेगा और विलेन को मारकर भगा देगा। हीरोइन हीरो की जाँबाजी पर फिदा होकर उससे अपने प्यार का इजहार करेगी।… समझ गए जनाब? हमारी फिल्म में स्क्रिप्ट नहीं होता। आप समय के मुताबिक अपना एक्शन करोगे और डायलॉग बोलोगे। आपके लिए इतना समझाना ही काफी है।”
तब तक शूटिंग साइट आ गई। कार रुकी। मिस्टर झाड़ूवाला कार से उतरा और शेखचिल्ली के लिए कार का दरवाजा खोल दिया। वह भी कार से उतरा। उसे लेकर झाडूवाला अपनी यूनिट के लोगों के पास गया और कहा- “दोस्तो, अपनी फिल्म के हीरो का स्वागत करो।”
सबने तालियाँ बजाकर शेखचिल्ली का स्वागत किया।
फिर झाड़ईवाला शेखचिल्ली को एक चट्टान पर खड़ा करा दिया और बोला- “अभी नदी से नहाकर बिकनी में हीरोइन निकलेगी और विलेन उस पर टूट पड़ेगा और उसके साथ रेप करना चाहेगा। आप इस चट्टान से कूदोगे और विलेन की पिटाई करोगे। विलेन भाग जाएगा और बिकनी गर्ल आपसे लिपटकर अपने प्रेम का इजहार करेगी।” फिर वह चीखा- “कैमरा ! लाइट! एक्शन!”
शेखचिल्ली ने देखा, नदी से एक लड़की निकली जो नाममात्रा का कपड़ा पहने हुए थी। उसके नदी से निकलते ही एक मुस्टंडा आदमी न जाने किधर से वहाँ आ गया और कुछ कहते हुए हीरोइन को दबोचने लगा और हीरोइन चिल्लाकर अपने बचाव की गुहार करने लगी-“बचाओ! बचाओ!”
शेखचिल्ली इस प्रकार उद्वेलित हो गया कि वह भूल गया कि यह फिल्म की शूटिंग हो रही है। वह चट्टान से ही चीखा- “अबे ! ओ मवाली! ठहर, आज मैं तुम्हें छट्ठी का दूध याद दिलाता हूँ। तुम्हें बताता हूँ कि माँ-बहनां के साथ कैसे बर्ताव करना चाहिए।”
उसकी चीख का जब उस मुस्टंडे पर कोई असर नहीं हुआ तो उसने चट्टान से इतनी जबर्दस्त छलाँग लगाई कि कैमरा मैन विस्मय से बोल उठा- “हाउ रियलिस्टिक! गजब का टैलेंट है…।”
झाडूवाला चीखा-“दो-चार ऐसे शॉट मिल जाऍं तो फिल्म बाक्स आफिस पर अपना जलवा दिखा देगी। शाबाश! जय हो घोंघड़बाबा की।”
शेखचिल्ली ने विलेन को अपनी बाँहों में जकड़ लिया और उसके बाल मुट्ठियों में पकड़कर उसका मुँह जमीन में रगड़ने लगा। विलेन किसी तरह उससे मुक्त होकर भाग गया। शेखचिल्ली उसके पीछे दौड़ता हुआ बोला- “अबे भागता कहाँ है? माँ का दूध पिया है तो रुक!”
मगर विलेन रुका नहीं।
ऊपर मिस्टर झाडूवाला कैमरा मैन से कह रहा था-“ऐसा शॉट तो मँजे हुए कलाकार भी नहीं दे पाते। एक्शन में तो अपना हीरो इतना भावपूर्ण लगता है कि उसका जवाब नहीं।”
इतने में हीरोइन अपनी बाँहें फैलाकर शेखचिल्ली की ओर बढ़ी और बोली- मैं तो दिलोजान से तुम पर फिदा हो गई। तुम न होते तो वह बदमाश मेरी इज्जत लूट लेता। अब मैं तुम्हारा शुक्रिया कैसे अदा करूँ?”
शेखचिल्ली अचानक पीछे हटा और बोला- “अरे… अरे! यह क्या कर रही हो… मैं शादीशुदा हूँ। मेरी बीवी है। परे हटो… दूर रहो।”
मगर वह लड़की बहुत अदा से लचकती-मटकती और पलकें झपकाती उसके पास आने लगी। शेखचिल्ली तेजी से पीछे हटा और वह लड़की तेजी से आगे बढ़ी। और देखते ही देखते शेखचिल्ली ने दौड़ लगा दी और हीरोइन भी उसे पकड़ने के लिए दौड़ी। ऊपर मिस्टर झाडूवाला चीख रहा था- “कट! कट!”
“उफ! सारा गुड़-गोबर कर दिया। यह अपना हीरो कहाँ भाग रहा है! दौड़ो! उसे पकड़ो!”
मगर शेखचिल्ली भागता ही रहा। उसको पकड़ने के लिए कैमरा मैन, लाइट ब्वाय आदि दौड़े मगर वह किसी की पकड़ में नहीं आया।
भागते-भागते उसे समुद्र तट दिख गया। वह उधर भागने लगा और इस तरह वह शूटिंग स्पॉट से एक बन्दरगाह पर पहुँच गया। बन्दरगाह पर पानीवाला एक जहाज उसे दिख गया और वह भागता हुआ उस जहाज पर चढ़ गया। एक जगह जहाँ बहुत सारा सामान रखा हुआ था वहाँ जाकर छुपकर बैठ गया।
अचानक एक तेज सायरन की आवाज हुई और वह जहाज तट छोड़ता हुआ समुद्र की तरफ बढ़ने लगा और धीरे-धीरे जहाज की गति तेज होती चली गई। शेखचिल्ली इस बार अनाम मंजिल की ओर बढ़ता जा रहा था।
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