शेखू आखिर शेखचिल्ली बन ही गया। मदरसे में जाने पर उसे मालूम हुआ कि वह चार साले का है। मदरसे से उसे पहली तालीम यही हासिल हुई कि यदि कोई उससे उसका परिचय पूछे तो वह बताएगा कि उसका नाम शेखचिल्ली वल्द शेख बदरुद्दीन है। और अगर इसके बाद उससे कोई उसकी उम्र पूछे तो वह बताए कि उसकी उम्र चार साल है। अमूमन रोज ही उसे अपना परिचय देना सिखाया जाता। शेखू होशियार तो था मगर उसकी होशियारी में मासूमियत बहुत थी जिसके कारण प्रायः उसे मौलाना साहब की डाँट पड़ जाती। इसी डाँट के डर से उसे अपना परिचय और अपनी उम्र अच्छी तरह याद हो गई। अलिफ, बे, ते भी उसने खूब मेहनत करके सीख लिया।

मदरसे के छह माह पूरे होने पर शेख साहब एक दिन उसकी तालीम के बारे में दरियाफ्त करने के लिए मदरसे पहुँचे। मौलाना ने उन्हें बताया कि शेखचिल्ली अन्य लड़कों से इस मामले में बेहतर है कि उसे जब कोई बात बताई जाती है, तब वह उस बात को इतनी बार रटता है कि वह बात उसे इस तरह याद हो जाती है जिसे कभी भूला ही नहीं जा सकता। मगर शेखचिल्ली में एक ऐब भी है कि उसे जो कुछ भी याद हो जाता है उसमें वह कोई सुधार करना सोच ही नहीं सकता। मौलाना का कहना था कि अभी की पढ़ाई के लिए तो यह बात ठीक है मगर रोज बदलती दुनिया में शेखू का यह गुण आगे की पढ़ाई के लिए ठीक नहीं है क्योंकि रोज नई खोजें हो रही हैं, रोज नए आविष्कार हो रहे हैं इसलिए छात्रा को तो लचीली सोच का होना ही चाहिए मगर शेखचिल्ली अगर ‘क’ से कबूतर सीखेगा और उसे कोई ‘क’ से कलम पढ़ाए तो वह अड़ जाएगा कि ‘क’ से कलम नहीं, कबूतर होता है।

शेख बदरुद्दीन यह सुनकर थोड़े दुखी हुए मगर मौलाना ने उन्हें तसल्ली दी- “इसमें दुखी होने की कोई बात नहीं है, समय आने पर सब ठीक हो जाएगा। शेखचिल्ली अभी बच्चा है और खुदा की खैर मानिए कि समय रहते उसकी कमजोरी हम लोगों की समझ में आ गई है। हम लोग उसकी यह कमी दूर करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। वैसे आपको जानकर खुशी होगी कि शेखचिल्ली ने छमाही परीक्षा में अपनी कक्षा में सबसे अधिक अंक हासिल किए हैं। यह उपलब्धि उसकी उसी कमी की बदौलत है। वह अपनी धुन का पक्का है और बताई गई बात को किसी भी कीमत पर याद रखना चाहता है। उठते-बैठते, चलते-फिरते आप उसे बुदबुदाते हुए देखेंगे… जब भी आप उसे बुदबुदाते हुए देखें तो समझ जाएँ कि वह कुछ याद करने की कोशिश कर रहा है।”

शेखू के बारे में शेख बदरुद्दीन को यह नई जानकारी मिली। वे मदरसे से घर वापस आ गए। रसीदा बेगम को उन्होंने सारी बातें बताईं। रसीदा बेगम ने ढाढ़स बंधाते हुए कहा- “मौलाना ने अपने शेखू में जो कमियाँ बताई हैं, देख लेना, एक दिन वही कमियाँ शेखू की विशेषता बन जाएँगी और उन कमियों की बदौलत ही शेखू की देश-दुनिया में शोहरत होगी। वह छमाही परीक्षा में जैसे अव्वल आया है वैसे ही सालाना परीक्षा में भी अव्वल आएगा।”

रसीदा बेगम की बातें सुनकर शेख बदरुद्दीन की चिन्ता कम हो गई और वे अपनी बेगम के साथ बैठकर सुनहरे कल के ताने-बाने बुनने लगे। बात चली तो चलती ही गई। अचानक रसीदा बेगम को याद आया कि शेखचिल्ली के लिए उन्होंने अजमेर वाले बाबा की मन्नत माँगी थी। याद आते ही रसीदा बेगम ने शेख बदरुद्दीन से कहा- “ऐ जी! शेखू जब गर्भ में था तब ही मैंने अजमेर वाले बाबा की मन्नत माँगी थी। अब शेखू चार साल से भी ज्यादा का है, हमें चलकर मन्नत उतारनी चाहिए। हो सकता है कि मन्नत उतरने पर शेखू का दिमाग और उसकी सोच दुरुस्त हो जाए! अजमेर वाले बाबा के बारे में मैंने सुन रखा है कि उनके दरबार से कोई खाली नहीं लौटता है… चलो न ! एक मन्नत पूरी हो चुकी है… हमें वह मन्नत तो उतारनी ही होगी… वहीं अजमेर वाले बाबा के सामने अपने शेखू की समस्या भी रख आएँगे। बाबा ही उसका निदान करेंगे और उसे दुरुस्त दिमाग बख्शेंगे।”

शेख बदरुद्दीन को इनकार करते नहीं बना। उन्होंने रसीदा बेगम को विश्वास दिलाया कि खेत-पथार का बन्दोबस्त देखकर दो-चार दिनों में अजमेर चलने का इन्तजाम कर लेंगे।

अपने पति की इसी आदत पर फिदा थीं रसीदा बेगम । मुँह से कुछ निकला नहीं कि वे उसको पूरा करने में लग जाएँगे…!

अपनी बेगम से बात करने पर शेख बदरुद्दीन का मन शान्त हो गया। शेखू के बारे में जो अजीबोगरीब खयालात उनके मन में आने लगे थे, वे स्वतः दूर हो गए। अब उनके मन में अजमेर यात्रा को लेकर नए खयाल उभरने लगे। कई वर्ष हो गए, वे गाँव से बाहर नहीं निकले। शेखू ने तो गाँव से बाहर का जीवन ही नहीं देखा है! शेख साहब सोच रहे थे कि यह पहला मौका होगा जब शेखू रेलगाड़ी देखेगा, मोटरगाड़ी, बस, रिक्शा-सबकी सवारी कराऊँगा उसे। अजमेर जाने से पहले पैसों का अच्छा बन्दोबस्त कर लूँ… ताकि बेगम की कोई ख्वाहिश अधूरी न रहे और शेखू को भी यह सफर याद रहे कि अब्बू के साथ गए तो रेलगाड़ी पर चढ़े, मोटरकार पर सफर किया, बस पर बैठे… रिक्शा पर घूमे…।

इस तरह शेख बदरुद्दीन ने पैसे का प्रबन्ध कर लिया और एक दिन अजमेर जानेवाली ट्रेन का टिकट कटाकर ले आए। रसीदा बेगम की खुशियों का ठिकाना नहीं रहा। शेखू के जन्म के बाद से वह भी कहीं घूमने नहीं गई थीं। शेख बदरुद्दीन की ओर देखकर रसीदा बेगम ने अनुमान लगा लिया कि इस यात्रा को लेकर शेख साहब भी खुश हैं। रसीदा बेगम ने खुशी-खुशी सामान सहेजा। रास्ते में खाने के लिए मठरियाँ और नमकीन तैयार किया। जब अपने ढंग से उन्होंने यात्रा की तैयारियाँ मुकम्मिल कर लीं तब शेख साहब से कहा- “ऐ जी! अजमेर वाले बाबा के पास जाने के लिए मैंने सारी तैयारियाँ पूरी कर ली हैं।”

शेख बदरुद्दीन अपनी बेगम की उत्सुकता समझ रहे थे। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा- “ठीक है बेगम ! हम लोग अपने घर से सुबह चार बजे निकलेंगे। हमने कमरू मियाँ को बैलगाड़ी लेते आने को कहा है। बैलगाड़ी से कमरूँ मियाँ हमें स्टेशन छोड़ आएँगे। जब तक हम लोग वापस नहीं आ जाते तब तक कमरूँ मियाँ ही घर की रखवाली करेंगे। सुबह छह बजे अजमेर जानेवाली टेक्न खुलेगी और दूसरे दिन सुबह छह बजे अजमेर पहुँचेगी। समझ लो कि चैबीस घंटे ट्रेन में ही बिताना होगा।”

यह सब सुनकर रसीदा बेगम रोमांचित हो उठीं। रात गहराती गई मगर बेगम रसीदा को कोई थोड़ी-सी झपकी लेने के लिए राजी नहीं कर पाया। सुबह चार बजे कमरूँ मियाँ बैलगाड़ी लेकर हाजिर हो गए। शेख बदरुद्दीन ने सामान बैलगाड़ी पर रखा और रसीदा बेगम अपने प्यारे बेटे शेखू की उँगलियाँ थामे बैलगाड़ी पर सवार हुईं। शेखू के लिए यह पहला मौका था जब वह अपने अब्बू और अम्मी के साथ किसी यात्रा पर निकल रहा था। अम्मी ने उसे खूब सजाया था और शानदार कपड़े पहनाए थे। उसका दिल झूम रहा था।

शेख बदरुद्दीन घर के दरवाजों में ताला लगा आए और बैलगाड़ी पर सवार होकर बोले- “चलो कमरूँ मियाँ!”

बैलगाड़ी चल पड़ी। रास्ते भर शेखू चहकता रहा। कभी अम्मी से पूछता-“रेलगाड़ी कैसी होती है?” तो कभी अब्बू से पूछता- “हम लोग मोटरगाड़ी पर भी सवारी करेंगे न?”

बैलगाड़ी अपनी रफ्तार में चलती रही और स्टेशन पर पहुँचकर रुकी। अजमेर जानेवाली ट्रेन प्लेटफार्म पर लगनेवाली थी। शेख बदरुद्दीन और कमरूँ मियाँ ने मिलकर बक्से उतारे और उन्हें लेकर प्लेटफार्म पर पहुँच गए। थोड़ी ही देर में ट्रेन आ गई। एक डिब्बे में खाली सीटें देखकर शेख बदरुद्दीन ने अपना सामान उस डिब्बे में रखवा लिया और कमरूँ मियाँ के हाथ में दस रुपए थमाते हुए कहा- “कमरूँ मियाँ! घर का खयाल रखना।”

कमरूँ मियाँ उन्हें आदाब करता हुआ चला गया। शेख बदरुद्दीन ने रसीदा बेगम और शेखू को डिब्बे में बैठाया और खुद भी डिब्बे में आ गए। गाँव के स्टेशन पर ट्रेन अधिक देर तो रुकती नहीं है इसलिए शेख बदरुद्दीन पहले से ही सचेत थे।

शेखू के लिए ट्रेन का यह सफर किसी अजूबे से कम नहीं था-झक झक, छुक-छुक, झक-झक, छुक-छुक करती रेलगाड़ी भाग रही थी और रेलगाड़ी की खिड़की से शेखू बाहर का नजारा देख रहा था-मुदित मन से।

तभी एक आदमी काला कोट पहने टेन के उस डिब्बे में आया और टेन में बैठे लोगों के टिकट माँगकर देखने लगा। शेखू टेन की खिड़की भूलकर उस आदमी को देखने लगा। वह काला कोटवाला जब शेख बदरुद्दीन के पास आया और उन्हें टिकट दिखाने को कहा तो शेख बदरुद्दीन ने जेब से दो टिकट निकालकर उसे दिखा दिये। तभी उस काले कोटवाले की नजर शेखचिल्ली पर पड़ी और उसने शेख बदरुद्दीन से पूछा- “और यह बच्चा? क्या आपके साथ है?”

“हाँ, जी हाँ!” शेख बदरुद्दीन ने उत्तर दिया- “हाँ-हाँ, यह मेरा बेटा है-शेखू ! तीन साल का है इसलिए टिकट नहीं लिया है।”

शेख बदरुद्दीन के मुँह की बात खत्म भी नहीं हो पाई थी कि शेखू ने टनक-भरी आवाज में कहा-“गलत! मैं शेखू नहीं! अपना नाम तो शेखचिल्ली है जनाब ! और मैं तीन साल का नहीं, चार साल का हूँ और पाँचवें साल में प्रवेश कर चुका हूँ, तब ही तो अम्मी और अब्बू मन्नत उतारने अजमेर वाले बाबा के पास जा रहे हैं…”

काले कोटवाले टी.टी.ई. ने एक बार शेखचिल्ली की तरफ देखा और उसका टिकट बनाकर शेख बदरुद्दीन से कहा- “अब तो आपको इसके टिकट के पैसे फाइन के साथ भरने ही पड़ेंगे।”

शेख बदरुद्दीन ने जेब से बिना कुछ कहे रुपए निकाले और टिकट एवं फाइन की रकम चुकाई। टी.टी.ई. के जाते ही शेख बदरुद्दीन ने शेखू के गाल पर एक चाँटा रसीद किया। बेचारा शेखू सोचने लगा- ‘अब्बू ने मुझे क्यों मारा?’

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