अजमेर शरीफ की यात्रा के आरम्भ में ही शेखचिल्ली को सच बोलना महँगा पड़ा कि यात्रा का मजा ही जाता रहा। शेख बदरुद्दीन ने भी महसूस किया कि उनके चाँटे ने शेखू की रेल-यात्रा का मजा किरकिरा कर दिया है। उन्होंने यात्रा के दौरान इस बात का पूरा ध्यान रखा कि शेखू को कोई बात बुरी न लगे।
अपने अब्बू की दरियादिली के कारण शेखचिल्ली उनके चाँटे की पीड़ा भूल गया मगर उसके दिलो-दिमाग को यह सवाल उद्वेलित करता रहा कि अब्बू ने मुझे क्यों मारा?
अजमेर से लौटने के बाद शेखचिल्ली रोज की तरह मदरसे जाने लगा। शेख बदरुद्दीन आम दिनों की तरह खेत का काम देखने जाने लगे। रसीदा बेगम घर के कामकाज में लग गईं। रसीदा बेगम ने महसूस किया कि शेखू कभी-कभी अचानक ही उदास हो जाता है और घंटों उदास रहता है।
एक दिन शेखू को उदास देखकर रसीदा बेगम ने उसे लाड़ देते हुए पूछा- “बेटा, तुम इतने गुमसुम क्यों हो? क्या सोच रहे हो?”
“कुछ नहीं अम्मी!” शेखचिल्ली ने सहजता से उत्तर दिया मगर रसीदा बेगम उसे पुचकारते हुए बोलीं- “मेरा राजा बेटा! अपनी अम्मी को नहीं बताएगा?”
अपनी अम्मी की पुचकार पाकर शेखचिल्ली पिघल गया और सुबकते हुए कहने लगा- “अम्मी! मेरी समझ में नहीं आ रहा कि अजमेर जाते समय रेलगाड़ी में अब्बू ने मुझे चाँटा क्यों मारा। मैं तो उनकी गलत-बयानी ही सुधार रहा था। मैं चार साल कब का पार कर चुका हूँ। अब्बू ने मदरसे में मेरी उम्र खुद चार साल लिखाई है। उस दिन टिकट माँगनेवाले से वे मेरी उम्र तीन साल बता रहे थे… मैंने सोचा कि भूलवश अब्बू ऐसा कह रहे हैं, सो मैंने अपनी उम्र सुधारकर बता दी… और अब्बू खफा हो गए… आखिर क्यों अम्मी? यही सवाल मुझे हमेशा हैरान करता है।”
“अच्छा, मेरे बेटे! अब इस सवाल को अपने दिमाग से झटक दे। अब्बू खफा हुए तो क्या ! आखिर तुम्हारे अब्बू तुम्हें प्यार भी तो करते हैं!” शेखचिल्ली की बातें सुनकर रसीदा बेगम का मन भर आया था। वाकई इस बच्चे ने तो कोई गलती की ही नहीं थी!…
रात को सोते समय रसीदा बेगम ने शेख बदरुद्दीन को शेखचिल्ली के दिल की हालत का खुलासा किया।
बेटे के मन में घुमड़ते सवाल को जान लेने के बाद शेख बदरुद्दीन बहुत दुखी हुए और रसीदा बेगम से कहा- “वाकई रसीदा! सच पूछो तो गलती सरासर मेरी थी। एक बच्चे का टिकट नहीं लेना पड़े, इस लोभ में मैंने टी.टी.ई. से उसकी उम्र तीन साल बता दी मगर शेखचिल्ली ने यह समझा कि मुझे उसकी सही उम्र याद नहीं है जिसके कारण उसने तुरन्त सुधार कर अपनी सही उम्र बता दी। सचमुच मुझे बहुत अफसोस है कि मैंने उसे चाँटा मारा। अब गलती तो हो चुकी । तुम शेखचिल्ली के मन से ये सारे खयालात हटाने के लिए उसे घर के कामकाज में लगाए रखा करो। मदरसे से लौटने पर हाथ-मुँह धुलाकर कुछ नाश्ता कराने के बाद उसे घर के छोटे-मोटे काम में लगा दो… इस तरह वह धीरे-धीरे दुनियादारी की बातें भी समझने लगेगा। बहुत सारी बातें सिखाई या बताई नहीं जातीं… तजुर्बे से आती हैं।
“हाँ, जरूर! मैं ऐसा ही करूँगी… तुम भी शेखू से बात-व्यवहार करते समय इस बात का खयाल रखना कि वह वाकई बहुत सीधा है और दुनिया के छल-प्रपंच वह बिलकुल नहीं समझता है।”
इस तरह अपने घर में शेखचिल्ली को दुनियावी जिन्दगी का सलीका सिखाने के लिए एक सधी हुई तैयारी शुरू हो गई।
दूसरे दिन शेखचिल्ली मदरसे से लौटा तो उसकी अम्मी ने उसे एक चवन्नी थमाते हुए कहा- “बेटा, यह कटोरा लेता जा और चार आने का सरसों का तेल ले आ। हाँ, ध्यान रखना-यह चवन्नी खोटी है। न जाने किसने हमें यह चवन्नी थमा दी! जैसे किसी ने यह चवन्नी देकर हमें ठगा है वैसे ही हम यदि इस चवन्नी को कहीं और चला लें, तो इसमें कोई बुराई नहीं है। यह बात मैं तुम्हें इसलिए बता रही हूँ कि यदि कोई दुकानदार यह चवन्नी खोटी बताकर लौटा दे तो तुम निराश मत होना और दूसरी दुकान की ओर चले जाना। थोड़ा धैर्य से काम लोगे तो यह चवन्नी कहीं-न-कहीं अवश्य चल जाएगी।”
हाथ में खोटी चवन्नी और कटोरा लेकर शेखचिल्ली घर से निकला। ऐसे, जैसे किसी बड़ी मुहिम पर जा रहा हो! उसे मन-ही-मन गर्व भी हो रहा था कि उसकी अम्मी ने उसे एक विशेष काम से बाजार भेजा है। खोटी चवन्नी चलाने के लिए शेखचिल्ली को अधिक मशक्कत नहीं करनी पड़ी। सर्वप्रथम वह जिस दुकान में गया उस दुकानदार ने उससे चवन्नी लेकर बिना उस पर ध्यान दिए ही गल्ले में डाल लिया और शेखचिल्ली के कटोरे में तेल डालने लगा। अपनी मुहिम की सफलता से शेखचिल्ली मन-ही-मन बहुत खुश हुआ तभी दुकानदार की आवाज ने उसे चैंका दिया। दुकानदार उससे पूछ रहा था- “अरे! तुम्हारा कटोरा तो बीस पैसे के तेल में ही भर गया… बताओ, पाँच पैसे का तेल कहाँ डालूँ?”
इस सवाल से शेखचिल्ली का दिमाग ही घूम गया… मगर उसने तुरन्त अपने पर काबू पाया और कटोरे को उलटकर दुकानदान से कहा- “लो, कटोरे की तल्ली में डाल दो!”
कटोरा उलटने से कटोरे में रखा गया तेल पुनः दुकानदार के तेल के मर्तबान में गिर गया और कटोरे की तल्ली में तेल लिये शेखचिल्ली दुकान से बाहर आया और सड़क पर दौड़ लगाते हुए चीख पड़ा- “चल गई भाई, चल गई!”
उसे भीड़-भरे बाजार में इस तरह चीखकर दौड़ता देख बाजार की सड़क पर चल रहे लोग भौचक्के हो गए और बिना कुछ सोचे-समझे शेखचिल्ली की तरह ही दौड़ने लगे। देखते-ही-देखते पूरे बाजार में भगदड़ मच गई। उन दिनों बाजार में कुछ गुंडे हाथ में तमंचा नचाते हुए आते थे और दुकानदारों से मनचाही रकम वसूल कर ले जाते थे। शेखचिल्ली की रट ‘चल गई’ से लोगों ने यही समझा कि शायद किसी मवाली ने गोली चला दी है। दुकानदारों को भी इसी तरह ‘चल गई’ की सूचना मिली तो आनन-फानन में दुकानों के दरवाजे बन्द होने लगे। हर तरफ हड़बोंग-सा मच गया। इसी बीच बाजार में करमू चाचा ने शेखचिल्ली को हाथ में कटोरा लिये भागते देखा तो पूछ बैठे- “का चल गई बेटवा?”
करमू को देखकर शेखचिल्ली ठमका और बोला- “अम्मी ने एक चवन्नी दी थी-खोटी चवन्नी, वही चल गई चाचा!” इतना कहकर शेखचिल्ली फिर घर की ओर दौड़ पड़ा। उसका मन बल्लियों उछल रहा था और वह जल्दी-से-जल्दी अपने घर पहुँचकर चवन्नी चल जाने की सूचना देने के लिए बेताब था।
दूसरी तरफ जब करमू को ‘चल गई’ की हकीकत मालूम पड़ी तब उसने दुकानदारों को तसल्ली बँधाई कि दहशत की कोई बात नहीं है। लोग एक बच्चे की अधूरी बात सुनकर घबरा गए हैं जिससे बाजार में अफरा-तफरी का माहौल है। करमू के समझाने-बुझाने से बाजार का माहौल सामान्य हो पाया।
उधर शेखचिल्ली जब अपने घर पहुँचा तब अम्मी ने उसे उलटा कटोरा पकड़े देखकर पूछा- “क्यों शेखू! तेल नहीं मिला या चवन्नी नहीं चली?”
“चवन्नी चल गई, अम्मी!” शेखू ने खुश होते हुए जवाब दिया।
“चल गई? तो क्या चार आने का तेल तू कटोरे की तल्ली में लेकर आया है?”
अम्मी के सवाल पर चैकन्ना होते हुए शेखचिल्ली ने कटोरे को सीधा किया और कहा- “बाकी तेल इधर है अम्मी।”
मगर यह क्या…शेखचिल्ली का दिमाग एकबारगी घूम गया। कटोरा तो खाली था। खाली कटोरा देखकर शेखचिल्ली ने घबराकर कहा- “अम्मी ! सच कहता हूँ- बीस पैसे के तेल से यह कटोरा भर गया था, तब दुकानदार ने मुझसे पूछा था कि पाँच पैसे का तेल कहाँ डालूँ? मैंने कटोरा उलटकर इसकी तल्ली में पाँच पैसे का तेल डलवा लिया और वहाँ से सीधे घर आया… मुझे नहीं मालूम कि कटोरे का तेल कहाँ गया?”
रसीदा बेगम अपने बेटे की मासूमियत पर फिदा हो गईं। डाँट का एक जुमला भी उनके मुँह से नहीं निकला… मन-ही-मन रसीदा बेगम ने सोचा- ‘खोटी चवन्नी न होती तो दुख होता…’ और प्रकट तौर पर वे शेखचिल्ली को कटोरे का उपयोग करना बताने में लग गईं।
बिना डाँट सुने ही शेखचिल्ली की समझ में आ गया कि उससे कैसी गलती हो गई है। उसने मन-ही-मन संकल्प किया कि वह अब कभी भी कटोरे की तल्ली में तेल नहीं लेगा।
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