” गुरु की खुशबु ” एक प्रेरक प्रसंग

” गुरु की खुशबु ”
एक प्रेरक प्रसंग/ फुर्सत के क्षणों में-
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guru ki khusboo prerak prshang
guru ki khusboo prerak prshang

निजामुद्दीन औलिया एक महान मुस्लिम संत हुए हैं।
एक बार एक गरीब आदमी,जिसकी बेटी विवाह योग्य थी,
संत औलिया के पास इस उद्देश्य से आया कि कुछ सहायता मिल जायेगी क्योंकि संत बड़े दयालु होते हैं।

संत से जब गरीब आदमी ने निवेदन किया तो संत ने कहा:” भई! मैं तो फकीर हूं,
मेरे पास तो कुछ धन है नहीं, ऐसा कर ये मेरी दो जूतियां हैं,
इनको ले जाओ।वह आदमी जूतियां लेकर चल दिया और सोचने लगा कि चलो,
जूतियां बेचकर दो वक्त की रोटियों का इंतजाम हो गया।

उधर अकबर के नवरत्नों में से एक अमीर खुसरो को तीव्र वैराग्य हुआ।
अपने जीवन भर की कमाई को एक ऊंट पर लाद कर,
यह सोचकर चल दिया कि यह समस्त धन अपने गुरु (निजामुद्दीन औलिया)
के चरणों में समर्पित कर दूंगा और शेष जीवन गुरु की सेवा करुंगा।

यह सोचता हुआ अमीर खुसरो गुरु के आश्रम की ओर बढ़ता जा रहा था और
दूसरी ओर से वह गरीब आदमी आ रहा था।अमीर खुसरो को अचानक एक सरस गंध आई,
नेत्र भर आये, मेरे पीर की, मेरे आका की, मेरे गुरु की गंध आ रही है।
मेरे गुरुदेव कहीं आसपास हैं ऐसा उसे अहसास होने लगा।

तभी वह गरीब आदमी नजदीक आया तो अमीर खुसरो ने उससे कहा:
” जल्दी बता तेरे पास क्या है? मुझे मेरे गुरु की खुशबु आ रही है।
गरीब आदमी ने बताया कि औलिया की पादुकाएं मेरे पास हैं।

बस फिर क्या था,
अमीर खुसरो बोले, ला, मेरे जीवन की समस्त कमाई ले ले और बदले में पादुकाएं मुझे दे दे।
क्या दृश्य रहा होगा?
गरीब आदमी सोच रहा है कि संत के द्वार से कोई खाली हाथ नहीं जाता
और उधर समस्त धन के बदले पादुकाएं पाकर अपने को मालामाल समझ रहा है।
कहा भी गया है कि समर्थ गुरु और समर्पित शिष्य की लीला अपरम्पार है।
जय गुरुदेव ।

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